Monday, July 13, 2009

एक ख्वाहिश.....

बड़ी मासूम सी ख्वाहिश हो....
ज़िंदगी को हर लम्हा.....
पीने की इजाज़त हो.....
तेरे आगोश में सिमटूं मैं......
ना फिर सांसों की गुज़ारिश हो....
यही ख्वाब हैं मेरे....
बस इन ख्वाबों की इबादत हो...
वो पहलू हो....
वो लम्हें हो......
ना कोई और फिर ख्वाहिश हो.....
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बस और कुछ नहीं.......।।

11 comments:

Udan Tashtari said...

भावपूर्ण!!

श्यामल सुमन said...

समर्पण का अच्छा भाव।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com

ओम आर्य said...

ख्वाहिशें तो सुन्दर होती हीं हैं...आपकी भी है. ख्वाहिशें कविता की शक्ल में!!

डॉ .अनुराग said...

इतना कुछ ..फिर भी कह दिया.....ओर कुछ नहीं....एक लम्हे में सारी जिंदगी मांग ली आपने....

M VERMA said...

तेरे आगोश में सिमटूं मैं......
ना फिर सांसों की गुज़ारिश हो....
इस गुज़ारिश को मेरा सलाम
बहुत खूब

anil said...

बहुत ही सुन्दर रचना !

अबयज़ ख़ान said...

बहुत शानदार लिखती हो.. मज़ा आ जाता है पढ़कर.. आंख भी नम हो जाती है...

अनिल कान्त : said...

बहुत अच्छी लगी जी

kalaam-e-sajal said...

achchi kavita. achchi khwahish.

Dr Jagmohan Rai

गौतम राजरिशी said...

अहा!
छोटी, किंतु बहुत ही मोहक कविता मैम!

M VERMA said...

तेरे आगोश में सिमटूं मैं......
ना फिर सांसों की गुज़ारिश हो....
अत्यंत भावपूर्ण रचना