Sunday, May 31, 2009

कठपुतली का होना....

किसी कठपुतली का होना बहुत अच्छा लगता है....बड़ी आंखों और चमकीले कपड़ों वाली कठपुतली... अक्सर मौका मिलते ही मैं खरीदने की पूरी कोशिश करती हूं.....शायद ये इंसानी फितरत कि...हर वो चीज़ जो आपको अच्छी लगती है आप पा लेना चाहते हैं....छोटी या बड़ी इससे फर्क नहीं पड़ती बस कठपुतली अच्छी लगती है और अच्छा लगता है उन्हें अपने पास देखना....मुझे नहीं पता,क्यों....इस कठपुतली ने आज अपने छह महीने पूरे किए.....छह महीने पहले ऐसे ही एक कठपुतली की तजबीज अंदर समायी थी....आज छह महीने बीते पर नहीं बीता मेरा कठपुतली होना....ऐसी कठपुतली जिसकी आंखों के सामने पर्दा नहीं....एकटक एक ही दिशा में एक ही सूरत के साथ साथ चलना.... हिलना... डुलना... जीना मरना....बस पलक नहीं झपक पाना.....जी नहीं पाना......पर वो सब करना जिससे ज़िंदा होने का एहसास होता...एक ऐसी ज़िंदगी... जैसे कहीं खोयी किसी की किस्मत की अधूरी तलाश....सड़क किनारे बैठे ज्योतिषी से भविष्य का हाल जानना....गोया किसी की किस्मत की चाभी.......बस खोलने की कवायद भर...और कई चीज़ों पर जमी धूल हट जाए....कई आवाज़ें आएं....कई बार पलकें झपकी जाएं....कई जागी रातों की नींद पूरी हो और उम्र भर की थकान लिए वो इंतज़ार की ज़द टूटे....कुछ महफिल सजे...कुछ मुस्कुराहटें सजें.....कुछ ऐसा हो और कुछ वैसा हो.......पर बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं कि कैसा हो.....कहां हो......कब हो.......पर सिर्फ हो.......बहुत शिद्दत से इंतज़ार इस होने का......पर वो वक्त संभलता नज़र नहीं आता....बस इतना ही चाहत....वो दूर बजती किसी धुन पर मदहोश होकर थिरकना और उन थिरकते कदमों से गिरना मुझे बहुत अच्छा लगता है....क्योंकि वो थिरकन मेरी ...जैसे ये थकान भी मेरी.....यह सफर मेरा अपना....जैसे कठपुतली का होना भी मेरा अपना.....मेरा खुद का....सबसे दूर....बिल्कुल निजी....उस हर चीज़ का होना ना होना.....जो तुमसे जुड़ती..... बेहद निजी.....तुम्हारे इंतज़ार के घुमावदार अर्थों में खुद को छिपाना जरूरी नहीं...अब तो जैसे किसी चीज़ का होना ना होना फर्क ही नहीं डालता....किसी कारवां की याद नहीं....किसी दरख्त की शाख याद नहीं....गर्म दोपहरी में कोई छांव याद नहीं....कोई आभास नहीं.....पर कोई शिकायत भी नहीं....बस आज के बाद उस कठपुतली का ना होना....बस और कुछ नहीं.....।।

8 comments:

मनोज गौतम said...

Bhav abhivaykti achha hai.

रंजना [रंजू भाटिया] said...

.बस आज के बाद उस कठपुतली का ना होना....बस और कुछ नहीं...खो गयी इन शब्दों में ..आपका लिखा अपने में डुबो लेता है ..

Nirmla Kapila said...

तनु जी बहुत ही संवेनशील् रचना है बेहतरीन भावा्भिव्यक्ति शुभकामनायें

रंजना said...

Kavitamay chintan.....

Sundar prabhavshali abhivyakti ke liye badhai.

डॉ .अनुराग said...

ऐसा लगता है मैंने जीती जागती कई कठपुतलियों को देखा है ....

संध्या आर्य said...

अब तो जैसे किसी चीज़ का होना ना होना फर्क ही नहीं डालता....किसी कारवां की याद नहीं....किसी दरख्त की शाख याद नहीं....गर्म दोपहरी में कोई छांव याद नहीं....कोई आभास नहीं.....पर कोई शिकायत भी नहीं....बस आज के बाद उस कठपुतली का ना होना....बस और कुछ नहीं.....।।

एक ही जन्म मे कई जिन्दगियाँ इंसान जीता है इंसान समय के हाथो की कठपुतली होता है जिसका समय बलवान होता है वह कठपुतलियो को नचाता है और जिसका क्मजोर वही शायद नाचता है .............आपने शायद इन्ही समयो से गुजरे हुये इंसान की मनसितति और भावो को,बहुत ही सलिके से व्यक्त करी है जो कबिले तारिफ है........पढ्ते वक्त आप अपनी रचना मे डुबा लेने की छ्मता रखती है........बधाई

ओम आर्य said...

बेहतरीन रचना.....

गौतम राजरिशी said...

आपकी लेखनी के जादू से जाने कैसे वंचित रहा अब तक मैं...नुकसान मेरा ही था।
कठपुतली के जरिये लगा एक पूरे व्यक्तित्व का शब्द-चित्र पढ़ रहा हूँ।

सब साक्षात उभरता हुआ...शब्दों की अनुकंपा या लेखनी का तिलिस्म?