Friday, August 15, 2008

बाज़ार/khabar

बड़े दिनों के बाद एक खबर आई जिसने थोड़ा सा झकझोर दिया,उस खबर को पढ़ने के बाद और उस पर अपने आप को बड़ा दिखाते हुए चर्चा करने के बाद अपनी आत्मा को धिक्कारने के अलावा और कुछ समझ नहीं आया ।समाज का कथित बुद्धिजीवी माने जाने वाले पत्रकारो की जमात में शायद ही कोई मानवीय संवेदनाओं और मूल्यों की बात करता होगा वरना तो सबके सब लकवा ग्रस्त नजर आते हैं।
खबर थी मध्यप्रदेश की जहां एक बूढ़े और मजबूर बाप 84साल के शंकर सिंह राठौर ने अपनी 57 वर्षीय मुंहबोली बेटी विमला बाई से शादी कर ली ...शायद ये खबर सुनने के बाद किसी की भी पहली प्रतिक्रिया मसालेदार हो सकती थी लेकिन सच जानने की जहमत किसी ने नहीं की ।खैर उस खबर को पढ़ा और पढकर अपने वजूद को धिक्कारा जिसमें ये ताकत तो नहीं कि किसी को रोटी दे लेकिन किसी के मुंह से निवाला छीनने की कवायद में जरुर हाथ बंटा दिया ।
शंकर सिंह और विमला बाई दोनों ने ये स्वीकारा कि हां उन्होने अकेलेपन को दूर करने के लिए शादी की है लेकिन सच शायद कुछ और ही था। अकेलेपन को दोनों बाप बेटी के रिश्ते में रहकर भी बांट रहे थे......लेकिन वजह सिर्फ एक ही थी ...उस गरीब लाचार और बूढे बाप को पता है कि वो बिस्तर पर पढ़ा है ,तबीयत लगातार खराब रहती है,बीवी को गुजरे छह महीने हो चुके हैं....और चौबीस घंटे नजरों के सामने 57साल की विधवा बेटी का उसके अलावा और कोई सहारा नहीं।विमला बाई इतनी पढ़ी लिखी नहीं है कि बाप के गुजरने के बाद अपनी जिंदगी सुकून से गुजार सकें।शायद उस बाप को और कोई चारा नजर नहीं आया कि वो जीते जी कागजो पर अपनी बेटी को अपनी बीवी घोषित कर दे जिससे उसकी बेटी जी सके और वो सुकून से मर सके क्योंकि शायद वो जानते है कि मरने के बाद जिंदगी का एक मात्र सहारा उनकी पेंशन उनकी बेटी को नहीं मिल पाएगी।
क्या कोई भी व्यक्ति उस बाप के अन्तर्मन को पढ़ने की या जानने की कोशिश कर सकता है कि उसने किन हालातों से गुजरने के बाद इतना बड़ा कदम उठाया होगा ।उस बाप के द्वन्द को शायद ही कोई समझ पाए जो ये जानते हुए भी कि समाज के कथित ठेकेदार उसकी जिंदगी अज़ाब कर देंगे,जीना मुहाल कर देंगे और उसके इस कदम को सामाजिक मान्यताओ के खिलाफ मानते हुए उसकी कितनी फजीहत करेंगे।
और ऐसा बिल्कुल नहीं कि 84साल के शंकर सिंह ने अन्जाने में ,बचपने में या फिर बिना सोचे समझे ये फैसला लिया हो।चौरासी साल की जिंदगी में उन्होंने जो कुछ देखा ,समझा जाना ....उसी के आधार पर ये फैसला लिया।वो शायद हमसे बेहतर जानते हैं कि हमारे बनाए गए इस समाज में अकेली औरत का जीना कितना मुश्किल होता है और तिस पर अगर वो विधवा हो तो सहारा देने के नाम पर जो हाथ सामने आते है उनमें सहारा कितना और दूसरी मंशाए कितनी होती है,ये सब जानते हैं।
उन्हे तो जो ठीक लगा वो उन्होने किया लेकिन उसके बाद शुरू हुआ तमाशबीनों का सिलसिला...जिन्होंने ये घोषणा कर दी कि क्या यही तरीका बचा था बेटी की जिंदगी संवारने का ,क्या यही हमारी संस्कृति है और क्या यही हमारे समाज का तानाबाना है।ये वही वर्ग है जो अपनी जिंदगी में लाख दिक्कत होने के बावजूद हमेशा दूसरों के बारे में जानकारी रखने में विश्वास रखता है..।और रही बात सामाजिक ताने बाने की तो कुछ दिन पहले ही उत्तर प्रदेश से खबर आई थी कि एक पोते ने अपनी 78साल की बूढ़ी दादी के साथ बलात्कार किया ।इसके अलावा दिनराता खबरों की बाढ़ में सबसे ज्यादा खबरे बलात्कार की ही होती हैं....जिसमें बाप बेटी के साथ ,भाई बहन के साथ और अब पोता दादी के साथ किस किस्म का रिश्ता निभा रहा है ,शायद सोचने की ज़रुरत नही ...ये भी हमारे समाज का एक हिस्सा हैं।
गरीबी से लाचार लोग अपनी बहन-बेटियों को बेच देते है...उन्हे कोई ये कहने नहीं जाता कि बेचो मत इन्हें पढ़ाओ..ये देवी का रुप है।दूसरी तरफ लोग सुबह अपने घरों से निकलते है...शंख बजाकर,,पूजा कर,मां के पैर छूकर ...लेकिन गाड़ी मे बैठने के बाद सिग्नल पर काम करने वाले बच्चों में से किसी एक को भी उठाकर उसे खाना तक नहीं खिलाते ...जिंदगी तो क्या ही बना पाएंगे।नवरात्र पर लोग कलश स्थापना करते हैं,छोटी बच्चियों को खाना खिलाते हैं उनके पैर छूते हैं.....लेकिन पूरे साल शायद ही किसी को अपनी जेब से पांच या दस रुपया निकालकर देते होगे.....लेकिन बातें सब बड़ी बड़ी और आदर्शों की करते हैं।
उस बाप की खबर इन लोगों के लिए जरुर मसाले दार हो सकती है जो अपनी बेटी से अनैतिक संबध बनाता है और साथ ही उसे धमका कर भी रखता है...क्योकि ये बिकाऊ खबर है।
लेकिन ये बाप तो बूढ़ा है,लाचार है ,दुनिया से कब चला जाएगा कुच पता भी नहीं....उसे ऐसी किसी जिस्मानी जरुरत का एहसास भी नहीं कि सामने बैठी विधवा बेटी के साथ बिस्तर में सोने की हसरत रखे.......फिर भी उसने ये कदम उठाया ।कोई भी नहीं जानता उसके हालात को ,उसकी सोच को क्योंकि किसी के भी हालात समझने के लिए हमें वो जिंदगी जीनी पड़ती है और जिसके लिए हममें से किसी के भी पास वक्त नहीं।
कोई नही जाएगा शंकर सिंह के मरने के बाद विमला बाई के सर पर हाथ रखने या उसका हाथ थामने ।कोई भी उससे ये नहीं पूछेगा कि खाना मिल रहा है या नही और जिंदा रहने का सवाल तो शायद ही कोई पूछे।
मेरा सवाल तो सिर्फ इतना है कि किसने इन लोंगो को हक दिया उनकी सीधी सादी जिंदगी में भूचाल लाने का .....
हमारे यहां तो शिफ्ट में काम होता है......लोग आते है,चले जाते है..और उसी तरह से खबरें भी आती है,चलती है और लोग भूलकर अगली खबर पर ध्यान लगाते हैं..और सब कुछ फिर से एक रुटीन में चलने लगता है।लेकिन हमने ये नही सोचा कि सिर्फ पच्चीस मिनट की फुटेज़ ने उस छोटे से शहर में रहने वाले शंकर सिंह और विमला बाई की कितनी बदनामी कर दी और बाकी बची जिंदगी जीने के तमाम रास्ते बंद कर दिए.........और अब तो इस खबर के बाद वो कागजी कार्यवाई भी पूरी नहीं हुई होगी जिसके लिए ये सारा बवाल हुआ।
क्योंकि हमारे जैसे जागरुक वर्ग ने तुरन्त अपना कर्तव्य निभाया और प्रशासनिक अधिकारियों के संज्ञान में ये बात लाकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली कि आपकी नाक के नीचे इतनी बड़ी घटना हो रही है और आप सो रहे हैं।
और रही बात सामाजिक मूल्यों की तो शायद ये बात या सच आपको इतना नागवार गुजरे कि आप बर्दाश्त ही न कर पाएं......
शायद आप नही जानते कि मेट्रोज़ में टीनएज लड़कियों का एबॉर्शन रेशो कहां जा रहा है......कितने लोग अपनी वर्जिनिटी टीनएज में लूज़ कर देते है और घर की चारदीवारी की बात करें तो क्या वहीं सड़ान्ध नहीं है......देवर -भाभी,जेठ-भाभी के अवैध संबधों की खबरे तो रोज़ ही खबरों में आती है।ये तो वो चीजें है जो सामने आती है और खबरों का हिस्सा बनती है लेकिन ऐसी कितनी ही गंदगी है जिसपर से पर्दा उठ ही नही पाता।क्योंकि हम सबको पाखंड की जिंदगी जीने की आदत पड़ गई है ।हम तो खबरों की ही दुनिया में रहते है,खबरों को ही जीते हैऔर खबरों में ही सोते है।अगर ये बातें समाज का कम पढ़ा लिखा वर्ग करे तो समझ भी आता है लेकिन समाज का चौथा स्तम्भ इतने खोखले विचारों और पाखंड की नींव पर खड़ा है..पता चलने पर ये एहसास घुटन वाला हो चला है कि हमसे बेहतर तो वो वर्ग है जो कम से कम इन बातों के लिए अपनी अज्ञानता की दुहाई तो दे सकता है।
अगर हम आज से कुछ साल पहले की बात करें तो बात कुछ हजम भी होती कि लोगों मे इतनी जागरुकता नहीं थी ,लोग जानते ही नहीं थे कि समाज में क्या हो रहा है।लेकिन आज का परिदृश्य एकदम बदल चुका है।आज हमारे पास अखबार है,रेडियो है और सबसे सशक्त माध्यम टेलीविज़न है।और इस पर भी समझ नहीं आए तो हम फिल्मों पर नज़र डाल सकते है।पहले कहा जाता था कि साहित्य समाज का दर्पण है लेकिन आज शायद फिल्में हमारा आईना बन चुकी हैं।
सामाजिक मूल्यों की दुहाई देने वाले लोग शायद ये भूल जाते है कि चलती गाड़ियों में ,ट्रेनों में ,अस्पतालों में और यहां तक कि स्कूलों में सब जगह बलात्कार की खबरें आती है ।आज कितने मांबाप ऐसे होगें जो अपनी बच्चियों को किसी टीचर के हवाले करके आशवस्त हो जाएं।
सवाल अगर करने हीं है तो अगर हम अपने आप से पूछें तो शायद बेहतर होगा कि सोसायटी कैसे खराब हो रही है या फिर हम उसी खराब और खोखली लेकिन ढो़गी सोसायटी में रहते है.....अपने आसपास नजर डाले हर इंसान एक दूसरे से झूठ बोलता नज़र आता है....क्या यही सब आदर्श सोसायटी का पैमाना होता है।
यही हकीकत है और इसे हम जितना जल्दी स्वीकार कर लें उतना ही बेहतर होगा इस समाज के लिए।
मेरा कहना सिर्फ इतना है कि दुहाई मत दो सामाजिक मूल्यों और संवेदनाओं की ,क्योंकि मानवीय संवेदनाएं अगर जिंन्दा होती तो दहेज के लिए लड़कियां जलाईं नहीं जाती ,प्रॉपर्टी के लिए भाई -भाई का कत्ल नहीं करता ,सिर्फ शक की बिनाह पर कोई पति अपनी पत्नी की सुपारी नही देता ,असफल प्रेम होने पर कोई तेज़ाब नहीं फेंकता और किसी पागल औरत को देखकर कोई उसका इलाज़ करवाता नाकि उससे अपनी जिस्मानी भूख मिटाता।

5 comments:

Amit K. Sagar said...

ब्लॉग की शुभकामनायें तनु जी व् अच्छी प्रस्तुति. साधुवाद-शुर्किया. लिखते रहिए.
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अनिल रघुराज said...

तनु जी, आगाज़ अच्छा है। सिलसिला बनाए रखें। जो हो रहा है, उसमें गलत क्या और क्यों है... निरंतर लेखन आपको इसके सही जवाब तक भी पहुंचा देगा। मानवीय संवेदनाएं अगर मरी हैं तो उसका स्रोत इंसान के अंदर ही नहीं, बाहर भी है। समाज और कानून का सख्त अनुशासन ही इंसान को इंसान बनाए रखता है। वरना उसमें और जानवर में कोई फर्क नहीं है।
मसला आपके बड़ा संवेदनशील उठाया है, जो उत्तराधिकार के कानून ही नहीं, हमारी सामाजिक सोच और प्रशासनिक व्यवस्था की एक बड़ी खामी को उजागर करता है।
और हां, थोड़ा छोटा लिखने की कोशिश करें।
कमेंट से ये वर्ड वेरिफिकेशन भी हटा दें। इसकी ज़रूरत नहीं है।

सजीव सारथी said...

नए चिट्टे की बधाई, निरंतर सक्रिय लेखन से हिन्दी ब्लॉग्गिंग को समृद्ध करें
आपका मित्र
सजीव सारथी

masaurhi said...

tanujee,hridya vidarak aur marasparshi blog padhkar aakhe bhar gai,pasand aaya.shukriya

ajay said...

तनु जी,
आपका 'बाजार/khabar' पढ़ा। सचमुच संवेदनाओं को झकझोर दिया इसने। हालांकि लंबा होने के वजह से थोड़ा बोझिल भी हो गया है। फिर भी आपने जो लिखा है, वो सोचने पर मजबूर करता है। आपने ख़बर के अंदर से ख़बर निकाला। ये काबिले तारीफ है। एक बाप का अपनी मुंहबोली बेटी से शादी करने का मतबल सिर्फ एक चटपटी ख़बर नहीं है, बल्कि ये समाजिक मान्यताओं और मूल्यों की विसंगतियों को भी उजागर करता है। आपने ब्लॉग में देश और समाज से जुड़ी अनोखी, दिलचस्प और मर्मस्पर्शी आलेखों को जगह दे रही हैं, ये आपकी गंभीर वैचारिक बौद्धिक क्षमता को उजागर करता है। मुझे विश्वास है आप भविष्य में इस तरह का लेख लिखती रही, तो निश्चित तौर पर ख़बरों की दुनिया में अलग और सबसे अगले पायदान पर नजर आएंगी। आपको हमारी तरफ से ढेर सारी शुभकामनाएं-अजय शेखर प्रकाश, वॉयस ऑफ इंडिया