Friday, December 5, 2008

अंधेरी ज़िंदगियां

यह ख़बर थोड़ी पुरानी है...लेकिन जिस वक्त इसे मैंने पढ़ा था तभी सोचा था कि इस बारे में ज़रुर लिखूंगी...लेकिन इस बीच मुंबई को दरिंदों ने दहला दिया और ये बात कहीं दब गई.....ये सिर्फ खबर नहीं है...ये उस अंधेरे की बात है जो हमारे सरकारी डॉक्टर्स (वो, जिन्हें भोले भाले लोग भगवान के बराबर पूजते है) की लापरवाही के चलते 38 लोगों की ज़िंदगी में पसर गया, हमेशा के लिए....

राजस्थान के सूरतगढ़ आईकैंप में कुछ बुज़ुर्ग पहुंचे थे अपनी आंख का इलाज़ करवाने और ऑपरेशन करवाने.....कैंप भी लगा,ऑपरेशन भी हुआ,लेकिन आंखे ठीक होने के बजाए कुछ ही घंटो बाद उनमें दर्द होने लगा और मवाद पढ़ गया....वो सारे बुज़ुर्ग जो आंखों के अच्छा होने की आस लिए अपने घर गए थे.....एक बार फिर लौटे उन्हीं डॉक्टर्स की चौखट पर.......

आंखों की बिगड़ती हालत को देखकर कुल 48 मरीज़ों को पीबीएम अस्पताल पहुंचाया गया जिसके बाद सिर्फ पांच मरीज़ों की आंखे खतरे से बाहर बताईं गईं और बाकी के मरीज़ों को एसएमएस अस्पताल पहुंचाया गया.....

और इस बीच मरीज़ों से एक सहमति पत्र पर दस्तखत करवा लिए गए---
मेरी आंख का मोतियाबिंद का ऑपरेशन सूरतगढ़ कैंप में हुआ है। पहली पट्टी के बाद इलाज के लिए मुझे पीबीएम अस्पताल में भेजा गया। यहां जांच के बाद डॉक्टरों ने बताया कि आंख में मवाद पड़ गई है। अब आंख में इंट्रा वेटेरनल इंजेक्शन लगाए जाएंगे। इसके बाद रोशनी आ सकती है और नहीं भी। मैं पूरे होश-हवास में पीबीएम हॉस्पिटल के डॉक्टर्स को इलाज की सहमति देता/देती हूं।’

शनिवार रात जिस वक्त मरीज़ों से दस्तखत करवाए जा रहे थे वो देखने की हालत में नहीं थे...ऑपरेशन के बाद मरीजों की आंखों में आई खराबी को चिकित्सकीय भाषा में एंडोप्थोलाइटिस इन्फेक्शन कहा गया है।ऐसे इन्फेक्शन की कई कारण हो सकते हैं। इनमें प्रमुख रूप से प्रयोग में ली गई दवाइयों-सोल्यूशन में जीवाणु होना, ऑपरेशन थियेटर का दूषित वातावरण, ऑपरेशन के दौरान काम में लिए गए कपड़े गंदे होना या मरीज के कपड़ों में जीवाणु होना आदि हैं। चिकित्सकों का मानना है कि मरीजों की ओर से इनमें से कोई कमी होती भी तो उससे इक्का-दुक्का मरीज ही प्रभावित होते।

हालांकि रविवार सुबह नौ बजे सीएमएचओ एचएस बराड़ व एसडीएम रोहित गुप्ता ने ऑपरेशन थियेटर का निरीक्षण किया। उपकरण भी जब्त किए गए हैं।लेकिन ये सारी कवायद अब तक उन बूढ़े लोगों की आंखो की रौशनी वापस लानें में नाकामयाब रही.....

सवाल सिर्फ यही कि सरकारी होने का मतलब हमेशा ऐसा ही क्यों होता है.....हम चिल्लाते सिर्फ तभी क्यों है जब अपने ऊपर गाज गिरती है...क्या ये सरकारी डॉक्टर्स तब भी इतनी ही लापरवाही दिखाते अगर उन बुज़ुर्गों में कोई इनका अपना मां-बाप या सगा संबधी होता......क्यों हम एक घिस-पिटे ढर्र पर यूंही चलते रहते हैं.....क्यूं नहीं हम खड़े होते....जब हमारे सामने कुछ ग़लत हो रहा होता है.....शायद सब एक जैसे ही हैं.....सिर्फ अपनी बारी का इंतज़ार करते हैं और......बस यूं हीं......यूंही इंतज़ार करते हैं।

ज्यादा से ज्यादा क्या होगा.....शायद सरकार की तरफ से थोड़ा सा मुआवज़ा दे दिया जाएगा.....उन डॉक्टर्स पर थोड़ी बहुत कार्यवाही कर दी जाएगी और उसके बाद ये ज़िंदगी यूंही बोझिल फिर से घिसटती जाएगी.....लेकिन कोई भी उन लोगों का दर्द बांटने नहीं जाएगा जो अब भी अपनी ज़िंदगी के वापस रौशन होने का इंतज़ार कर रहे हैं, लेकिन ये नहीं जानते कि वो कभी अपनी खुशियों को दोबारा हासिल कर पाएंगे या नहीं.......क्योंकि डॉक्टर्स तो सहमति पत्र लेही चुके हैं कि आंखो की रौशनी जा भी सकती है और वापस आ भी सकती है।

14 comments:

mala said...

आपके विचार बहुत सुंदर है , आप हिन्दी ब्लॉग के माध्यम से समाज को एक नयी दिशा देने का पुनीत कार्य कर रहे हैं ....आपको साधुवाद !
मैं भी आपके इस ब्लॉग जगत में अपनी नयी उपस्थिति दर्ज करा रही हूँ, आपकी उपस्थिति प्रार्थनीय है मेरे ब्लॉग पर ...!

manvinder bhimber said...

tanu,
this system is like this only.....the questoin is....who is the frist to chenge it.....ur effort is great..

वर्षा said...

और ये किसी एक कैंप की बात नहीं, ऐसे कितने ही कैंप लगते हैं जो रोशनी देने के बजाए छीन लेते हैं, कुछ दिनों पहले सीतापुर में भी ऐसा ही हुआ। अगर दो चार को सस्पेंड भी कर दिया तो किसी की आंखों की रोशनी तो नहीं लौटाई जा सकती। चाहे आतंकवाद हो या आंखों का ऑपरेशन दरअसल हम हर जगह जानलेवा लापरवाही बरतते हैं और फिर मरते हैं।

BrijmohanShrivastava said...

इतनी बड़ी लापरवाही डाक्टर्स से हो ही नहीं सकती /ये झोला छाप डाक्टर्स ने मिल कर केम्प लगाया होगा /हम लोग भी तो ऐसे है जो जरासा चमत्कार दीखते ही सुपारी काटने के सरोंता से आँख का ओपरेशन कराने तत्पर हो जाते हैं / एक महाराज जी की धूनी में चिमटा लगा रहता था आग से निकाल कर लाल चिमटा मरीज़ के अंग में छुला देते /एक सज्जन को साइटिका हो गया -डाक्टर ने २१ दिन का ट्रेक्शन बताया /एक दिन महाराज जी के पास से बड़े खुश होकर लौट रहे थे बोले देखो डाक्टर वेबकूफ बना रहे थे =महाराज ने घुटने में दो जगह और एडी में दो जगह चिमटा से जलाया और देखो मैं कितना बढ़िया चल पा रहा हूँ /पाँच दिन बाद एक दिन वे अस्पताल में दिखे पूछा "क्यों बाबूजी "? बोले यार बो घुटना और एडी के जख्म पक गए तो ड्रेसिंग कराने आया था / तो मेरा विनम्र निवेदन ये है कि हमको लोगों को जागरूक करना चाहिए और यदि ऐसे केम्प लग रहे हों तो वह की पूरी जानकारी लेकर जरा भी ऐसी कोई बात दिखे तो जिले के सिविल सर्जन को सूचित करना चाहिए /
देखिये मेडम ,कभी भी कोई डाक्टर लापरवाही नहीं करता है अन्तिम साँस तक मरीजों को बचने की कोशिश करता है लेकिन स्वम मरीज़ या उसके तीमारदारों की गलती से कुछ अघटित हो जाता है तो हम अस्पतालों की दुर्गति करने पर उतारू हूँ जाते है /अस्पताल को आग तक लगना चाहते हैं /इस लापरवाही के लिए आपको उच्च स्तर तक जाकर जाँच कराना चाहिए और जो हो गया सो तो हो गया मगर आप उनको उचित मुआबजा दिलवाने के लिए उन्हें मार्ग दर्शन तो प्रदान कर सकती है

tanu sharmaa said...

ब्रजमोहन जी,आपने शायद खबर को ठीक से पढ़ा नहीं ये झोलाछाप डॉक्टर्स की खबर नहीं है..ये उन डॉक्टर्स का महिमामंडन है,जिन्हें सरकारी अस्पताल में नियुक्त किया जाता है...ये सोचकर कि ग़रीबों और आम जनता को इलाज़ आसानी से मिल पाए। अगर ये झोलाछाप डॉक्टर्स की खबर होती तो मैं ज़रुर उस बात को चिन्हित करती...लेकिन यहां तो बात ही अलग है...ये सरकारी नुमाइन्दें है...डॉक्टर्स हैं..मरीज़ों की सेवा करना इनका धर्म है...लेकिन लापरवाही का ये नज़ारा...क्या इनकी संवेदनहीनता को उजागर नहीं करता और क्या आपका ये दृष्टिकोण ये नहीं बताता कि हम सब शायद ऐसा ही सोचकर पीछा छुड़ा लेते हैं कि ये किसी झोलाछाप का काम होगा....मैं दिन-रात खबरों की दुनिया में रहती हूं,काम ही मेरा यही है...इतनी बड़ी ग़लती मैं नहीं कर सकती..कि झोलाछाप और सरकारी तंत्र में फर्क ही ना पता चले..आपसे निवेदन है कृप्या दोबारा पढ़ें...



और वर्षा तुम्हारा कहना बिल्कुल ठीक है,ये कोई पहला मौका नहीं है...जब हमनें इस तरह की कोई खबर पढ़ी है..शायद दिन-रात इसीं में गुज़र जातें है...और शायद हम भी कहीं न कहीं संवेदनहीन होते जा रहें हैं...और हमारी ही ये लापरवाही है जो इस तरह से सामने आती है...उन डॉक्टर्स को ज़रा सा भी डर होता तो क्या वो लापरवाही बरतने की सोच भी सकते थे...

tanu sharmaa said...

माला और मनविंदर जी आप दोनों का भी धन्यवाद ......

PN Subramanian said...

आप जैसे संवेदनशील व्यक्तित्व का हम नमन करते हैं.अब ग़रीब लोग सरकारी अस्पताल में ना जाएँ तो कहाँ जाएँ. प्रेस के माध्यम से मामले को उठाया जा सकता है. हलाकी उन भुक्तभोगियों का तो कुछ अधिक कल्याण नहीं हो पाएगा, परंतु कुछ हद तक चिकित्सकों की लापरवाही पर अंकुश लग सकता है. आभार.
http://mallar.wordpress.com

Devesh Gupta said...

अपनी संवेदनाओं को ज़ाहिर करने का ये सबसे सही तरीका है .... दरअसल हम जो काम करते हैं उसमें ये सिर्फ हमारे लिये एक खबर मात्र है .... हर खबर पर संवेदना प्रकट करने का न ही समय होता है और कई बार प्रोफेशनल मजबूरी भी हमें ऐसा करने से रोकती है ... on air हमे क्या बोलना है, कैसे react करना है उसका एक set तरीका है ... लेकिन ब्लाग पर तुमने जिस खूबसूरती से अपनी संवेदनाएं ज़ाहिर की ... बधाई ...

संतोष कुमार सिंह said...

आप की राय अपेक्षित हैं,------ दिलों में लावा तो था लेकिन अल्फाज नहीं मिल रहे थे । सीनों मे सदमें तो थे मगर आवाजें जैसे खो गई थी। दिमागों में तेजाब भी उमङा लेकिन खबङों के नक्कारखाने में सूखकर रह गया । कुछ रोशन दिमाग लोग मोमबत्तियों लेकर निकले पर उनकी रोशनी भी शहरों के महंगे इलाकों से आगे कहां जा पाई । मुंबई की घटना के बाद आतंकवाद को लेकर पहली बार देश के अभिजात्य वर्गों की और से इतनी सशंक्त प्रतिक्रियाये सामने आयी हैं।नेताओं पर चौतरफा हमला हो रहा हैं। और अक्सर हाजिर जवाबी भारतीय नेता चुप्पी साधे हुए हैं।कहने वाले तो यहां तक कह रहे हैं कि आजादी के बाद पहली बार नेताओं के चरित्र पर इस तरह से सवाल खङे हुए हैं।इस सवाल को लेकर मैंने भी एक अभियाण चलाया हैं। उसकी सफलता आप सबों के सहयोग पर निर्भर हैं।यह सवाल देश के तमाम वर्गो से हैं। खेल की दुनिया में सचिन,सौरभ,कुबंले ,कपिल,और अभिनव बिद्रा जैसे हस्ति पैदा हो रहे हैं । अंतरिक्ष की दुनिया में कल्पना चावला पैदा हो रही हैं,।व्यवसाय के क्षेत्र में मित्तल,अंबानी और टाटा जैसी हस्ती पैदा हुए हैं,आई टी के क्षेत्र में नरायण मुर्ति और प्रेम जी को कौन नही जानता हैं।साहित्य की बात करे तो विक्रम सेठ ,अरुणधति राय्,सलमान रुसदी जैसे विभूति परचम लहराय रहे हैं। कला के क्षेत्र में एम0एफ0हुसैन और संगीत की दुनिया में पंडित रविशंकर को किसी पहचान की जरुरत नही हैं।अर्थशास्त्र की दुनिया में अमर्त सेन ,पेप्सी के चीफ इंदिरा नियू और सी0टी0 बैक के चीफ विक्रम पंडित जैसे लाखो नाम हैं जिन पर भारता मां गर्व करती हैं। लेकिन भारत मां की कोख गांधी,नेहरु,पटेल,शास्त्री और बराक ओमावा जैसी राजनैतिक हस्ति को पैदा करने से क्यों मुख मोङ ली हैं।मेरा सवाल आप सबों से यही हैं कि ऐसी कौन सी परिस्थति बदली जो भारतीय लोकतंत्र में ऐसे राजनेताओं की जन्म से पहले ही भूर्ण हत्या होने लगी।क्या हम सब राजनीत को जाति, धर्म और मजहब से उपर उठते देखना चाहते हैं।सवाल के साथ साथ आपको जवाब भी मिल गया होगा। दिल पर हाथ रख कर जरा सोचिए की आप जिन नेताओं के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं उनका जन्म ही जाति धर्म और मजहब के कोख से हुआ हैं और उसको हमलोगो ने नेता बनाया हैं।ऐसे में इस आक्रोश का कोई मतलव हैं क्या। रगों में दौङने फिरने के हम नही कायल । ,जब आंख ही से न टपके तो फिर लहू क्या हैं। ई0टी0भी0पटना

BrijmohanShrivastava said...

फी चाहता हूँ /मुझसे गलती ये हुई कि मैं यह समझा कि सूरतगढ़ में आई केम्प लगा और हालात बिगड़ जाने पर पी एम् बी अस्पताल पहुचाया /मेडम असल में होता क्या है कि ग्रामीणों की अज्ञानता का फायदा ये नकली डाक्टर उठाते रहते है इसलिए मैंने समझा के ऐसा ही कुछ हुआ होगा / मेरा उदेश्य आपके आलेख की टीका करना नहीं था न ही डाक्टर्स का समर्थन / क्योंकि मेरा यह मानना रहा है के डाक्टर जानबूझ कर किसी मरीज़ को नहीं मारता और वाहन चालक जानबूझ कर गाडी नहीं टकराता -वह सड़क पर पड़े कुत्ते को भी बचाकर निकल जाना चाहता है लेकिन दुर्घटना पर पिटता वही है /मरीज़ की मौत पर अस्पतालों पर पथराव मैंने देखा है जब कि डाक्टर की कोई गलती नहीं /
मैं पुन : आपसे माफी मांगता हूँ
मेरा उद्देश्य कतई आपकी आलोचना करने का नहीं था /ऐसे ग़लत काम करके व्यक्ति के जीवन के साथ खिलवाड़ करने वालों को वास्तव में उचित शिक्षा प्रद दंड की व्यवस्था होना ही चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी पुन्राब्रत्ति न होने पावे

tanu sharmaa said...

कोई बात नहीं ब्रजमोहन जी...बड़े-बड़े शहरों में ऐसी छोटी-छोटी ग़ल्ती होती रहती हैं....)

नरेश सिह राठौङ said...

जंहा चारो ओर सरकारी विभागों मे अन्धेरगर्दी मची हो वहा एसा होना रोजमर्रा की बात है । किसी भी जिम्मेदार को आजतक सजा नही हुइ है ज्यादा से ज्यादा उसे सस्पेन्ड कर के खानापूर्ती कर दी जाती ।

बवाल said...

तनु जी, बडा दुखदाई सच है जी ये तो. मालिक भली करे.

Vijay Kumar Sappatti said...

aapka ye lekh apne aap mein ek nahi kai kahaniya kah jaata hai .


bahut badhai

vijay
http://poemsofvijay.blogspot.com/