Monday, November 3, 2008

बालिका -वधू

बात करें अगर छोटे पर्दे की तो कुछ बात करने लायक नजर नहीं आता....चारों तरफ वही रंगे-पुते नकली और भयावह सास-बहू के चेहरे .......वोही एक-एक शॉट के दस-दस रीटेक्स दिखाना.... जबतक कि कोई चैनल ही ना बदल दे......

लेकिन इन सबके उलट हाल ही में लॉंच हुए चैनल कलर्स पर आने वाला सीरियल-बालिका-वधू-अपनी लोकप्रियता की सारी सीमाएं लांघ चुका है......बेदम और उबाऊ हो रहे छोटे पर्दे पर बालिका-वधू एक ताज़ी सांस की तरह आया....
इस सीरियल में सबकुछ इतना गुंथा हुआ है कि कहीं कोई कमज़ोर कड़ी नज़र नहीं आती ....बेहद सादगी के साथ इसका प्रैजेंटेशन,सभी किरदारों का सशक्त अभिनय,केंद्रीय पात्र आनन्दी का भोलापन और मां साहब की भूमिका में सुलेखा सीकरी का किरदार इसमें जान डाल देता है।

पूरा सीरियल राजस्थान की पृष्ठभूमि में रचा गया है,हर चीज़ पर इतना बारीकी से ध्यान दिया गया है....कि कहीं कोई कमी नज़र नहीं आती ......।
लेकिन एक बात जो थोड़ा कचोटती है वो ये है कि क्या सामाजिक बुराई --बालविवाह--को दिखाने का थोड़ा भी लाभ मिलेगा......टीआरपी मिल रही है,पैसा मिल रहा है,लेकिन क्या सामाजिक जागरुकता आ रही है ......क्या वोही मांबाप जो इसे देख रहे है,पसंद कर रहे हैं......अपने आप को रोक पाएंगे जब आखातीज़ आएगी और ना जाने कितने ही मासूम आनन्दी और जगिया की तरह इस बंधन में बांध दिए जाएंगे.....।

शायद किसी को याद भी नहीं होगा कि कुछ सालों पहले मध्यप्रदेश के धार ज़िले में एक महिला अधिकारी के हाथ काट दिए गए थे....जो बाल विवाह जैसी कुरीति का विरोध कर रही थी.....मुझे पूरा विश्वास है कि कोई मुकदमा कायम नहीं हुआ होगा और किसी को सज़ा नहीं मिली होगी.....क्यों कि हम सब अपनी कानून व्यवस्था के बारे में बखूबी जानते हैं.....हमारे यहां कानूनी तौर पर अवैध घोषित कुरीतियां मरती नहीं हैं.. कोई वक्त गुजर कर भी सचमुच नहीं गुजरता।


इस सीरियल में आनंदी अनगिनत सवाल पूछती है लेकिन उसके जबाब उसे नहीं मिलते....वह कमसिन, कोमल और निर्मल है और उसके ज़हन में हज़ार सवाल उठते हैं।

इस सीरियल में कहीं कोई कमी नहीं सबकुछ एक खूबसूरत जड़ाऊ हार की तरह....बस इच्छा यही है कि इसकी चमक उन अंधे मांबापों की आंखे खोलने में कामयाब हो जो अंधविश्वासों और कुरीतियों को अपने तर्कों की तलवारें चलाते हुए अपने बच्चों को होम किए जाते हैं....

राज्य सरकारें भी बातें बड़ीं-बड़ीं करती है लेकिन कुरीतियों को रोकने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाती...... वोट बैंक के होव्वे ने ही इन कुरीतियों को पाला हैऔर बढ़ावा दिया है।

11 comments:

सोतड़ू said...

हालांकि ये सीरियल मैंने देखा नहीं है इसलिए कह नहीं सकता कि ये बाल विवाह के प्रति सहानुभूति पैदा नहीं करता है। बाल विवाह करवाने वाले लोगों को अच्छा किरदार बता कर हम इसके पक्षधरों को आधार देते हैं। टीवी-फ़िल्म का प्रभाव हाल ही में मुन्ना भाई ने दिखाया है। बच्चों पर शक्तिमान का प्रभाव भी हम देखते आए हैं... इसलिए इस मीडिया का समझकर इस्तेमाल बेहद ज़रूरी है...
हां लोकप्रिय तो कलर्स पर ही आने वाला बिग बॉस भी हो रहा है- जिसमें जिन लोगों को लिया गया है वो यकीनन रोल मॉडल तो नहीं ही होने चाहिए....

Ek ziddi dhun said...

aur ek baat ye ki balika vadhuen kitne dimantions se baaten kartee hain...yahi khaas baat hai ki ye bal vivah ko celebrate nahi karne lagta aur mahaj sahanubhuti tak bhi seemit nahi rahta balki jhakjhorta hai....aur sath mein tickers ke bhi madhyam se baat kah dee jaati hai

डॉ .अनुराग said...

चलिए कही न कही लोकप्रिय माध्यम कुछ संदेश तो दे रहा है

वर्षा said...

waise mai bhi ziddi dhun de dahmt hoon. serial to nahi dekha lekin promo aur kuch tukde jaroor dekhe. in serials me itne aasun bhar diye jaate hain ki kuch aur bachta hi nahi. aur ye srl bhi bal vivah par chot karne ke bajay use celebrate karta hua dikhta hai.kya is srl me anandi ek bar bhi puchti hai ma meri itni kam umra me shadi kyon karayi

tanu sharmaa said...

जहां तक मुझे लगता है...मैनें ये महसूस किया है कि कहीं न कहीं ये हमारी सामाजिक कुरीतियों को दिखा रहा है और बिना किसी लाग लपेट के चोट भी कर रहा है...शायद इसीलिए मैनें इसे इतने गौर से देखा और लिखा...सिर्फ नकली आंसू नहीं है इसमें बल्कि बहुत कुछ है जो हमें जगाता है कि आसपास इतनी आसानी से सब कुछ हो जाता है और शायद हम जानकर भी अंजान बने रहते हैं...

Fighter Jet said...

waise to sabhi kutch se sahmat hu siway ek ke..
ki is serial me sub kutch accha hai..iska presentation..bilkul thik nahi hai...sabke kapde..ghar aise jaise raja maharaj ke ghar ke ho..kitne aise pariwar hong jinka rahn sahan ,khan paan is serial ke logo jaisa hoga..halaki is serial ka subject accha hai,logo ki acting bhi acchi hai..lekin costunes bilkul illogical hai..

वर्षा said...

वैसे ये बात तो ठीक है कम से कम एक सामाजिक मुद्दे को लेकर तो सीरियल बना। इसी बहाने कुछ लोगों को सोचने के लिए ये विषय फिर से मिल गया। फिर सास-बहू की भेड़ चाल से कुछ अलग तो हुआ

मुकुंद said...

aap achchha likh ranhi hai

Devesh Gupta said...

दरअसल वर्षा, आनंदी अपनी मां से जल्दी शादी होने से संबंधित सवाल इसलिये नहीं करती क्योंकि उसके लिये शादी का मतलब सिर्फ नये कपड़े बनना .. घर में समारोह होना आदि है वो शादी के सही अर्थ को कहां समझती है... और जहां तक बात बाल विवाह को celebrate करने की है तो मुझे ऐसा नहीं लगता क्योंकि इस सीरियल का अच्छा प्रसेंटेशन ही है जो इसको इतना popular बना रहा है ...बड़ा हवेली जैसा घर ... राजा महाराजाओं जैसे कपड़े ... चमक दमक वाले रंग ... और सेट .. ये वो eliment है जो आज के comptition के दौर में किसी टीवी शो को हिट करने के लिये ज़रूरी है ...दरअसल हमारे देश में लोग सिर्फ चमक देख कर ही खुश होते है ...

ambrish kumar said...

bahash achchi hai.

dinesh kandpal said...

अच्छा लिखा है आपने। पूरे ब्लाग को देखा तो लगा कि आप की कल्पनाओं का समन्दर इस आकाशगंगा में कैसे समायेगा। बैचेनी छलक रही थी हर तरफ। ब्लागं का रंग संयोजन मन को शांति देने वाला है। सादगी लगता है जीवन में बसी है। बालिका बधू आपको आकर्षित कर रहा है, जानकर अच्छा लगा, मुझे भी अच्छा लगता है लेकिन न जाने क्यों मैं इस समालोचना की दृष्टि से देख ही नहीं पाता। ये सीरीयल मुझे आकर्षिक करता है..आनन्दी को देखने के लिये, सास, उसकी दादी सा, मुझे तो आनन्दी का मां भी आकर्षित करती है, जगदीश और उसके ताऊजी भी उम्दा हैं..बाल विवाह और बालिका वधू लगता है ठीक ठाक रिलेट हो रहे हैं..फिर भी ... ठीक है.. उम्दा लिखा है। बधाई..