Friday, May 2, 2008

truth/sach

हर दिन यही सोचती हूं कि॥
आज नहीं तो कल,
सपनों की दुनिया से दूर...
ज़मीं पर रखके पांव,
सच को स्वीकार करुं....
पर सच रोज़ बदल जाता है,
रोज़ सोचना,रोज़ बदलना...
क्या यही सच है
क्या यथार्थ की ज़मीं से सपनों मे लौट आना
जैसे कोई लौटा है मां के गर्भ में॥
क्योंकि उससे सुरक्षित जगह दुनिया में कोई नहीं...!!!!!

2 comments:

Amit K. Sagar said...

बेहद उम्दा. हर मन के यथार्थ पर खरी आवाज़. इसके लिए धन्यवाद. आगे भी अपेक्षा.

"VISHAL" said...

very nice, dil ko chhoo liya, sach me sapno ki duniya se surakshit koi jagah nahi. lekin sath hi ye bhi kahoonga ki hakikat ko kabhi na kabhi sweekar karna hi hota hai.