Monday, December 15, 2008

एक माइक्रोपोस्ट...

इक छोटा सा जाल.....
जाल से लिपटे तार...
तार में उलझीं ज़िंदगियां...
ज़िंदगियों के फंसे आयाम.....
और उनसे निकलती सिसकियां....
ये ख़बर तो नहीं.....फिर क्या.......??

9 comments:

विनय said...
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विनय said...

संवेदनात्मक!


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चाँद, बादल और शाम
http://prajapativinay.blogspot.com/

MANVINDER BHIMBER said...

ज़िंदगियों के फंसे आयाम.....
और उनसे निकलती सिसकियां....
dil ko chu gai ye panktiyan

समयचक्र - महेद्र मिश्रा said...

bahut badhiya rachana .

P.N. Subramanian said...

खबर यह कि सिसकियों को घुटन हो रही है.

संगीता पुरी said...

बहुत सुंदर ।

हिमांशु said...

खूबसूरत रचना . धन्यवाद .

विवेक said...

बहुत सुंदर...

प्रशांत मलिक said...

bahut sahi likha..