Thursday, September 4, 2008

मेरी पहली उड़ान...

वो किसी बड़ी सी चिड़िया के पंखो का फैलाव,जिसके पीछे से झांकती मेरी कौतूहल भरी आंखे,पूरी दुनिया को देखने को बेकरार...

वो सफेद चमकीले बादलों का झुंड...ओफ्फ... बिल्कुल बचपन में सुनी परियों की कहानियों जैसा..जिसमें उड़ रही थी मैं और मचल रहा था मेरा मन....सिर्फ एक बार उन्हें छू लेने को....सबकुछ बिल्कुल मेरी दुनिया जैसा...बिल्कुल ऐसा लग रहा था जैसे किसी चित्रकार ने जी भरकर रंग उड़ेले हैं...धरती के आंचल पर।

नीले कांच जैसा आसमान, ऊपर से धुंधला सा दिखने वाला जंगल, झील,नदी ,नाले पहाड़ सब कुछ बहुत ही विस्मित कर देने वाला ...मानों मैं इस धरती को नहीं बल्कि किसी और दुनिया को देख रही हूं....शब्द हीं नहीं मेरे पास उस पल को और उस अहसास को बयां कर पाने के लिए।

कोई सीमा नहीं कहीं कोई बंटवारा नहीं ,सिर्फ और सिर्फ दूर तक फैला वो आंचल जो बेकरार सा दिखता सब कुछ अपने में समाहित करने के लिए...
कितनी देर तक अपने आप को समझाती रही कि ये मेरे ख्वाबों की दुनिया जैसी तो ज़रुर है...लेकिन है हकीकत ....
मैं उड़ रही थी हकीकत में,इतना रोमांच मैनें अपनी जिंदगी में कभी महसूस नही किया जितना तब किया और सच बताउं तो आज भी उन पलों को बार-बार जीने का मन करता है।
वो मेरी पहली उड़ान थी और सब कुछ मेरे सामने खिलौने नुमा था..किसी कवि की खूबसूरत कल्पनाएं,किसी चित्रकार की बेहतरीन तूलिका का चित्रण और उस पर किसी की मदहोश कर देने वाली आवाज़....सब कुछ था उस वक्त मेरे पास,मेरे सामने।

वो उस चिड़िया के पंख थे ,जिनपर मैं सवार थी या फिर मेरी कल्पनाओं,मेरे ख्वाबों को पंख लग गए थे,उस वक्त तो मैं सच में कुछ भी समझ नहीं पा रही थी ,सिर्फ जीना चाहती थी उन पलों को...उस नीले कांच जैसे आसमान में उड़ते वक्त का अहसास भुलाए नहीं भूलता...।
इतना खूबसूरत था वो सब कुछ कि अब भी जागते,सोते मैं अक्सर उसी उड़ान में पहुंच जाती हूं और फिर देखती हुं एक अगला ख्वाब......।।।

3 comments:

संगीता पुरी said...

कितना अच्छा लिखा है !

Devesh Gupta said...

बहुत अच्छा लिखा है ....

shailendra said...

wow...thanks tanu ji