क्या है सच.....?
ये हममें से कोई भी नहीं जानता।
और शायद जानने की कोशिश भी नहीं करता।
और कई बार जानकर भी अंजान हो जाता है।
कई चीज़ें ऐसी होती हैं,जिन्हें समझने के लिए हमें सोचना पड़ता है और कई बार सोचने की जरुरत भी नहीं पड़ती ,सबकुछ क्रिस्टल की तरह साफ नज़र आने लगता है।लेकिन मेरे साथ ऐसा नहीं होता.....लेकिन तुम्हें सोचना नहीं पड़ता??
तुम्हारे सामने सब कुछ साफसाफ अपने आप चलकर सामने आ जाता है,फिर ऐसा मेरे साथ क्यों नहीं होता???
तुम्हीं ने बताया था कि रिश्ते कुछ नहीं होते ,आंखे बंद करके देखो तो चारों तरफ रिश्तों की जगह शीशे नज़र आते हैं।बिल्कुल विश्वास नहीं होता कि आंखे बंद करके कैसे देखा जा सकता है??
लेकिन तुमने कहा कि देखो तो ज़रुर दिखता है,सारे शीशे दरअसल हम सबका रिफ्लेक्शन दिखाते हैं,उसमें हमारा अक्स नज़र आता है,लेकिन वो अक्स नहीं जो हम देखना चाहते हैं बल्कि वो,जो हम नज़रअंदाज़ करना चाहते हैं।और इन्हीं शीशों में दरअसल हमें हमारा कमीनापन,वहशीपन,मतलबपरस्ती और वो कालापन नज़र आता है,जो हम असल ज़िंदगी में देख नहीं पाते।
उन शीशों को या फिर यूं कहे उन रिश्तों को उनकी नज़र से देखें तो उनकी जगह बिल्कुल ठीक नज़र आती है,क्योंकि वो अपनी नज़र से ,अपने मतलब से और अपनी जगह बिल्कुल ठीक होते हैं।दरअसल वो ,वो नहीं होते जो हम उन्हें देखना चाहते हैं..........................सच में बहुत ही अजीब सा कॉम्पलिकेटड सा लगता है,ये सब।
लेकिन सच तो ये है हर इंसान मतलबी होता है,अपने मतलब के लिए अपनी ज़िंदगी अपने हिसाब से जीने की कोशिश करता है।किसी पर किसी का कोई एहसान नहीं................क्या प्यास लगने पर कोई बिना पानी के रह सकता है या फिर बिना खाए किसी का गुज़ारा हो सकता है?
जवाब है......नहीं
फिर झूठे वायदे और एहसान क्यों?
हर कोई अपने लिए जीता है,सबकी अपनी पर्सनल लाइफ होती है,इंसान सोता,जागता,खाता,पीता सिर्फ और सिर्फ अपने लिए ही करता है ।उसकी खुद की ज़रुरतें उसे कमाने के लिए मजबूर करती हैं और फिर भी हम सभी एक दूसरे पर एहसान जताने की कोशिश करके शायद अपने आप को तसल्ली देने की कोशिश करते हैं या फिर शायद अपना अहम संतुष्ट कर पाते है कि मैनें अपनी ज़िंदगी में फलां के लिए ये किया और उसके लिए वो किया .............!!!!!