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Sunday, October 16, 2011

सिर्फ एक बार.....


आओ..
बैठो..
देखो..
झांको भीतर इस मन के...
यहां ताप है,महक है...
इंतज़ार है..
एक बार
सिर्फ एक बार..
इतिहास के बदलते आवर्तन में...
ठहरे हुए इस वक्त को..
इतिहास बनने दो..

Monday, October 11, 2010

इमोश्नल होना.......

इमोश्नल होना ..बड़ी अजब प्रक्रिया लगती है जिन्दगी की.....एकदम कंडिशन्ड......टाईम बार्ड....पर्सन बार्ड.... मैने देखा है....लोगो के लिए.....सड़क चलते किसी मरते इंसान में और बिस्तर पर पड़े किसी 'अपने' के लिए इमोश्नल होना बिल्कुल अलग....ऑफिस में किसी को कहते सुना कि दिक्कतो और डिप्रेशन से बाहर होना हो तो अस्पताल के चक्कर लगा कर आओ....दूसरो की तकलीफ के आगे खुद की तकलीफ भूल जाओगे.....
नही होता मुझसे .....तकलीफें बढ़ जाती हैं....और डिप्रेशन भी...
अब तक एहसास नही था....किसी को इमोशनल होते...रोते नही देखा....
कभी जाना ही नही....मुझसे ज्यादा भी कोई होगा ...जो रोता होगा..
पर उसे देखा तो इमोश्नल होने के मायने बदल गए
आंसुओ की तासीर बदल गई और रिश्तों का नया खाका खिंच गया
दुनिया की तहो में जमा कुछ सर्द सा एहसास सामने आया और रोयां रोयां खड़ा कर गया
अपने आंसू कहीं पीछे छोड़ जाने का मन हुआ और मन चट्टान सा हो गया
तब से अब तक आंसू नही निकले....
अब मन करता है .....उसके आंसू सोख लेने का....
हमेशा के लिए तस्वीर मे कुछ नए रंग भरने का......
रिश्तो में भी बहुत कुछ बारीकियां छिपी होती है......अच्छी भी और कुछ बेस्वाद भी....
खामी ना जाने क्यूं नज़र नही आती......
बहते बहते बस सबकुछ अपना सा ...इतना नज़दीक हो जाता है कि शायद आंखे भी आदी हो जाती है और अपना-दूसरे का फर्क करना भूल ही जाती हैं....ये भी सुना था कि आदतें यदि रोकी ना जाएं तो लत बन जाती हैं....
शायद मुझे भी लत लग गयी है....उसकी
अब जैसे रोकने की....मिलने की आदत हो गयी है
कुछ भी ....बस मुसलसल ही सही...
उसके आंसू भी....अपनी कोशिश भी.....
मन बस कुछ करता भी है तो.....
संग गुनगुनाने का...
वाजिब...गैर वाजिब सवाल जवाब...कही दफन कर देने का....
शक शुबहा.....अस्तित्व ही मिटा देने का....
और जिंदगी को नए आयाम देने का....
एक नयी सुबह का ...
एक नयी शाम का......!!

Friday, February 19, 2010

तुम्हारे....मेरे लिए....

नींद मयस्सर नहीं अब मुझे...रात होती है... क्योंकि ये रात की मजबूरी है... वर्ना यूंही जागकर सोना....एक आदत सी बन चुकी है...ज़िंदगी बिताना भी...बस अब एक आदत सी है... जिंदगी के हर दोराहे पर.. कश्मकश पर...फलसफे पर.....गिरती-पड़ती.....दौड़ती-हांफती......कई ज़िंदगियों की जंग के बीच...सुनाई देती है...कुछ सन्नाटो की आहट....इक जंगल डूबा जो गहरे सन्नाटे में...बस वोही गुमा देता है इन यादो को....जीने की आदत को.... सन्नाटों की गमक को...उस हर चीज़ को जो देती आमद तुम्हारी...तुम्हारे आने की....तुम्हारी यादों की....तुम्हारी आँखो की....तुम्हारी उस एक मुस्कान की.... जिसके लिए ये ज़िंदगी भी कम इंतज़ार के लिए... पर फिर भी......इंतज़ार उस ज़िंदगी का जिन बर्फ़ बनती..रिश्तों की तासीर गुमाना चाहती हूं....क्योंकि..पता नहीं क्यों...एक गर्माहट जो तुम्हारे चेहरे से झांकती महसूस होती है...जिंदगी के एक और दिन के लिए....इक इंतज़ार के लिए और तुम्हारे ...मेरे लिए.......!!

Thursday, December 3, 2009

कुछ भी तो नहीं पता....

ऐसा लगता ही नहीं कि जिंदगी से रंग उड़ गए हैं.....कभी कभी काली-सफेद उदासियों के बीच से सतरंगी हसरतों ने तमाम दबाब के बावजूद अपने हक़ की छाप छोड़ी है..... हां कई दफा..... ज़िद... तौहीन... ज़िल्लत...कसमसाहट....कुछ नहीं बल्कि सब कुछ जुड़ने से पहले ही टूटने का एहसास.....या खुदा यहां तो नासूर से इन मर्ज़ों ने तमाम नीम-हक़ीमों....पीर-फकीर....के चक्कर कटवा दिए....पर कमबख्त ना मालूम कहां से ये नामुराद इश्क़ अपनी ज़ड़ें कहीं गहरे जमा करता चला गया....जो अब पेशानी पर पड़ने वाले बलों के साथ सिकुड़ती आंखों से नज़र ही नहीं आतीं....ये इश्क है...या फिर इश्क में ही डूबे रहने का मोह...या फिर कोई नाफिक्री ज़िद्द.....कभी नहीं....कोई नहीं समझ पाया.....एक जोश...जोश की तलाश....क्या करुं...उसका जौहर कहीं का नहीं छोड़ता कमबख्त....मेरी खोयी सांसों में रवानगी की बयार पैदा करता....इस दुनिया-जहां की फिक्र को पीछे रखता...बड़ी अदावत के साथ अपनी सांस बुलंद करता.... यूं तो बदमिज़ाज़ी के किस्से ना सुने....ना जाना....पर सिर्फ सुना....एक बदमिज़ाज लड़की......अब अच्छा सा लगने लगा है.....ज़िंदगी मानों बड़ी तफ्सील से जीने की लत पड़ गयी है...ये इंतज़ार ऐसा....जिसने इफ़रात में वक्त का दान दिया.....ना कोई हड़बड़ाहट....ना कोई चौंकना.....ना आगे बढ़ना...ना पीछे छूट जाने का ही अफसोस....एक गज़ब विस्तार मिलता जाता है...हर मोड़ पर....सांसे भी तो पहचान कर चुकी हैं...कब थमना है...कब डूबना है...और कब कलेजे को चीरते बस बाहर ही निकल पड़ना है......सांसों का बढ़ना,थमना,डूबना...कसकर एक दूसरे के आवेग को थामना... मानों जैसे कुछ पीछे छूटता जा रहा है...कुछ कहना था...शायद शब्द कम पड़ गए......कुछ रह गया....हां शायद कुछ देना भी तो था...बस हाथ थामने की मियाद खत्म हो गयी......कुछ अटपटा सा होता जा रहा है...पर क्या.....कोई नहीं बता पाता....मेरे अंदर मचती उथल-पुथल......कहीं मुझे कुछ कर गुज़रने से रोकना चाहती है......मेरे सपनों को वो सतरंगी ग़लीचा बस उठाए सा घूम रहा है....कहां जा रहा है...कहां जाना चाहता है....कुछ नही पता....कुछ भी नहीं पता........

मैं कहां जा रही हूं....मेरे सपने...मेरी अकुलाहट......

हां एक अच्छी नींद का भी इंतज़ार........

Friday, October 30, 2009

तुम हो...

मेरा सावन भी तुम हो...मेरी प्यास भी तुम हो....
सहरा की बांहो में छुपी...वो आस भी तुम हो...
तुम यूंतो बहुत दूर हो मुझसे....पर
एहसास ये होता है....मेरे पास भी तुम हो....
हर ज़ख्म के आगोश में है दर्द तुम्हारा.....
हर दर्द में तस्क़ीन का एहसास भी तुम हो...
खो जाओ तो वीरान सी हो जातीं हैं राहें....
मिल जाओ तो फिर जीने का एहसास भी तुम हो....
लिखती हूं तो तुम ही उतरते हो कलम से....
पढ़ती हूं तो लहज़ा भी तुम हो.....
मेरी आवाज़ भी तुम हो....
क्या कहूं...क्या तुम समझ पाते हो....कि तुम क्या हो....

Sunday, August 23, 2009

उदासियों का सबब.....

उदासियों का सबब जो लिखना...
तो ये भी लिखना...
कि चांद...तारे...शहाब आंखे...
बदल गए हैं....
वो ज़िंदा लम्हें जो तेरी राहों में....
तेरे आने के मुंतज़िर थे....
वो थक के राहों में ढल गए हैं....
वो तेरी यादें....ख्याल तेरे....
वो रंज तेरे....मिसाल तेरे...
वो तेरी आंखे....सवाल तेरे...
वो तुमसे मेरे तमाम रिश्ते....
बिछड़ गए हैं...उजड़ गए हैं....
उदासियों का सबब जो लिखना...
तो ये लिखना....
मेरे इन होठों पर तुम्हारी दुआ के सूरज
पिघल गए हैं...
तमाम सपने ही जल गए हैं....
बाद मरने के तुम मेरी कहानी लिखना
कैसी हुआ सब बर्बाद, लिखना...
ये भी लिखना कि मेरे होंठ हंसी को तरसे....
कैसे बहता रहा मेरी आंखों से पानी......
लिखना....!!

Sunday, May 31, 2009

कठपुतली का होना....

किसी कठपुतली का होना बहुत अच्छा लगता है....बड़ी आंखों और चमकीले कपड़ों वाली कठपुतली... अक्सर मौका मिलते ही मैं खरीदने की पूरी कोशिश करती हूं.....शायद ये इंसानी फितरत कि...हर वो चीज़ जो आपको अच्छी लगती है आप पा लेना चाहते हैं....छोटी या बड़ी इससे फर्क नहीं पड़ती बस कठपुतली अच्छी लगती है और अच्छा लगता है उन्हें अपने पास देखना....मुझे नहीं पता,क्यों....इस कठपुतली ने आज अपने छह महीने पूरे किए.....छह महीने पहले ऐसे ही एक कठपुतली की तजबीज अंदर समायी थी....आज छह महीने बीते पर नहीं बीता मेरा कठपुतली होना....ऐसी कठपुतली जिसकी आंखों के सामने पर्दा नहीं....एकटक एक ही दिशा में एक ही सूरत के साथ साथ चलना.... हिलना... डुलना... जीना मरना....बस पलक नहीं झपक पाना.....जी नहीं पाना......पर वो सब करना जिससे ज़िंदा होने का एहसास होता...एक ऐसी ज़िंदगी... जैसे कहीं खोयी किसी की किस्मत की अधूरी तलाश....सड़क किनारे बैठे ज्योतिषी से भविष्य का हाल जानना....गोया किसी की किस्मत की चाभी.......बस खोलने की कवायद भर...और कई चीज़ों पर जमी धूल हट जाए....कई आवाज़ें आएं....कई बार पलकें झपकी जाएं....कई जागी रातों की नींद पूरी हो और उम्र भर की थकान लिए वो इंतज़ार की ज़द टूटे....कुछ महफिल सजे...कुछ मुस्कुराहटें सजें.....कुछ ऐसा हो और कुछ वैसा हो.......पर बिल्कुल भी अंदाज़ा नहीं कि कैसा हो.....कहां हो......कब हो.......पर सिर्फ हो.......बहुत शिद्दत से इंतज़ार इस होने का......पर वो वक्त संभलता नज़र नहीं आता....बस इतना ही चाहत....वो दूर बजती किसी धुन पर मदहोश होकर थिरकना और उन थिरकते कदमों से गिरना मुझे बहुत अच्छा लगता है....क्योंकि वो थिरकन मेरी ...जैसे ये थकान भी मेरी.....यह सफर मेरा अपना....जैसे कठपुतली का होना भी मेरा अपना.....मेरा खुद का....सबसे दूर....बिल्कुल निजी....उस हर चीज़ का होना ना होना.....जो तुमसे जुड़ती..... बेहद निजी.....तुम्हारे इंतज़ार के घुमावदार अर्थों में खुद को छिपाना जरूरी नहीं...अब तो जैसे किसी चीज़ का होना ना होना फर्क ही नहीं डालता....किसी कारवां की याद नहीं....किसी दरख्त की शाख याद नहीं....गर्म दोपहरी में कोई छांव याद नहीं....कोई आभास नहीं.....पर कोई शिकायत भी नहीं....बस आज के बाद उस कठपुतली का ना होना....बस और कुछ नहीं.....।।

Monday, March 9, 2009

तुम्हारे संग.....

कितनी अन्जान जगह होती हैं जहां से पांव रखकर गुज़र जाना होता है.....जिनसे कभी कोई मतलब नहीं होता...बस बिन छुए...बिन मतलब पार होना होता है....उन खामोश राहों पर कोई आवाज़ देकर भी नही रोकता....कोई रास्ता बताने वाला भी नही होता....आपकी निगाहें कभी किसी की खामोशी का इतनी बेसब्री से इंतज़ार भी नही करती.....उन रेतीली,पथरीली ज़मीन पर किसी नमीं युक्त तुम्हारे जैसे धरती के टुकड़े की आस नही होती....शाय़द कुछ ऐसी ही होती हैं अन्जानी राहें...जहां से मेरे साथ-साथ सभी कभी ना कभी गुज़रते होंगे....पर कई बार इन पथरीली राहों पर यूंही चलते-थकते....इस टूटते बदन के साथ सांसे भी साथ छोड़ने का दम भरने लगती हैं...और इन बोझिल होती दोपहरी में....गर्म थपेड़ों के साथ वो ज़िंदगी की गर्माहट को अपने संग लिए जाने को मचलती हैं....और मैं यूंही किसी रेतीली ज़मीं की एक दोपहरी पर बिन पानी मछली की तरह फड़फड़ाती नज़र आती हूं....कि शायद इसी दरो-दीवार के बीच से तुम्हारी यादों के गुज़रते कारवां की मुझ पर नज़र पड़े और मेरी इन उखड़ती सांसो को तुम अपनी सांसों से दोबारा ताज़ा कर दो जिससे इस दहकती ज़मीं पर कोई नर्म और गीला ग़लीचा इन सांसों पर सुर्खाब के पर लगाके मुझे ताज़ी हवा के झोंके सा उड़ा ले जाए......तुम्हारे संग...!!

Thursday, March 5, 2009

क्या वो तुम थे....

यूही गुज़रते मैनें झांका उस रेलगाड़ी की खिड़की से बाहर.....जो मेरी सोच को बाहर की चीज़ों मे तब्दील कर.....एहसास करा रही थी....तुम्हारा..... उन खेतों मे...... किसानों के चेहरों पर...... दूर तक हरे-भरे फैले खेतो की हरियाली में....उन उड़ते परिंदो में.....और दूर तक नज़र आते उस आसमान में.......मुझे हर तरफ तुम ही नज़र आ रहे थे.....शायद वो तुम थे या मेरा ख्याल....जो हर गुज़रने वाले स्टेशन के साथ ही ले आता था तुम्हें एक नए रुप ....एक नए परिवेश में.....तुम्हे देखते-बूझते वो दिन गुज़रा.....शाम ढली और रात का वोही सन्नाटा अपने पूरे शबाब के साथ उतरा जो तुम्हें वहां से छीन कर ले जाने की पूरी तैयारी में था.....जैसे-जैसे रात अंधेरे की ओढ़नी सर पर डाल अपने रुप पर उतर रही थी.....मेरी धड़कने भी बढ़ रही थी...क्योंकि तुम्हारा चेहरा धुंधलाता जा रहा था.....वो कभी पेड़ो के पीछे छुप रहा था......तो कभी रेलगाड़ी के नीचे छुप रहा था......तो कभी कहीं से उड़कर आ रहे धुंए की ओट लेता भाग रहा था......तुम्हें देखने की कवायद करते-करते ज़रा मुंह बाहर निकालती तो........कमबख्त वो कोयला छिटक कर आंख में भर रहा था.....ऐसा जैसे वो भी चिढ़ रहा हो मेंरे प्यार से .......मेरी शिदद्त से जो तुम्हें हर शै मे तलाश कर रही थी.....फिर अँधेरा बड़ा...और बड़ा होता चला गया और तुम्हारी तस्वीर धुंधलाती चली गई.....पर फिर भी मैं बाहर झांक रही थी कि कहीं तो तुम नज़र आओगे......उस बियाबान अंधेरे जंगलों में......सुनसान राहों-जंगलों में धक-मक चलती रेल की पटरी की आवाजों के बीच..... मेरी धड़कनों की आवाज़ कही दब सी रही थी.......मेरी धड़कने....रेल की रफ्तार से कदम मिलाने की जुगत में थीं..... और मेरी आंखे किसी चालाक बिल्ली की तरह अँधेरे में देखने की अभ्यस्त हो रही थीं......औऱ फिर तभी किसी सुनसान अंजान अंधेरो के बीच.....आधी रात किसी अनकहे स्टेशन के फासले पर दूर कहीं एक चमक नज़र आयी और ना जाने क्यों वो ही चमक थी जो तुम्हारी आंखो मे नज़र आती थी.......मैं हड़बड़ाहट में कही पीछे छूटते उस स्टेशन पर उतरने को व्याकुल तुम्हारी तलाश कर रही थी और लग रहा था जैसे वो तुम थे और वहीं मुझे बुला रहे थे.......गाड़ी की रफ्तार के साथ ही पीछे छूटते स्टेशन पर जाने क्यों लग रहा था कि वो तुम थे....क्या वो तुम ही थे..........

Friday, February 13, 2009

तुम्हारी तस्वीरें.....

तुम्हारी तस्वीर.....हर सुबह की शुरुआत एक गर्माहट के साथ कराती....हर रात को एक खुशमिज़ाज अंदाज़ से समेटती ....तुम्हें नहीं पता.....तस्वीरों में तुम मुस्कुराते....मुझे देखते हो....नाराज़ नहीं होते........और हां कभी-कभी.....ना......कभी भी नहीं.......बस बात नही करते.....लेकिन तुम्हारी तस्वीर बोलती है.....जब मेरे अंदर उतरती है.....खो जाती है......मेरे साथ.....तुम्हारे संग गुज़ारे हर लम्हें को जीने के लिए.........बहुत ज़ब्त....करती हूं......जब जी नहीं पाती........वो सारे लम्हें.......दोबारा तुम्हारे साथ.....हरपल तुम्हारे साथ........मेरे अंदर.....मेरे साथ....मेरे दिल-दिमाग....मेरे ज़हन.....मेरे ख्याल.... कहीं भी कोई जगह नहीं....जहां तुम नहीं होते.....एक तस्वीर मेरे मोबाइल के चेहरे पर......तुम्हारा एक ख्याल....मेरे चेहरे पर.......बाकी सब अंदर......मेरे अंदर..........लगता है....... जैसे मैं दो हूं......एक तुम-एक मैं..........कभी तुम ज्यादा तो कभी मैं.........कोई रेस नहीं.....कोई बंटवारा नहीं........सबकुछ सहज़.....अपने आप..........कभी पता नहीं चलता..........तो कभी खो जाती हूं.........लेकिन तुम्हारे अंदर ही तो समाती हूं........कभी भी दूर नहीं.....हमेशा पास......उस ख्याल की तरह .....जो हमारी ज़िंदगी पर छाया.....बिन बताए.....अनकहा...अंजाना....अनचाहा
पता नहीं तुम्हें मालूम या नहीं......एक दरवाज़ा है तुम्हारी तस्वीरों में.......जहां से रोज़ मैं पहुंचती हूं.....तुम्हारे भीतर......तुम्हें बिन-बताए......पता नहीं रात में......कुछ भटकता है तुम्हारे सीने में....या नहीं.....बस डर लगता है.........तुम जाग ना जाओ.......मैं बताना नहीं चाहती कि मैं रोज़ जाती हूं.....उसी तस्वीर से तुम्हारे अंदर........दोबारा खोना नहीं चाहती.....रात में भी नहीं.....ख्यालों मे भी नहीं.........तुम जागना मत रात में......वर्ना दोबारा छीन लोगे मुझसे....थोड़ा सा मैं और थोड़ा सा तुम.....एक बार फिर भटकने के लिए छोड़ दोगे......उसी अंधेरे में जो दिन में भी फैलता और रात में भी नहीं सिमटता......बस छाता हमेशा के लिए मेरे ऊपर मेरी ज़िंदगी पर...

Monday, February 9, 2009

रंग और तुम....

तुम्हें नही मालूम लेकिन मैं रंग भरना चाहती हूं तुम्हारे अंदर......वो सारे रंग जो तुमने जबरदस्ती अपने अंदर से निकाल कर फेंक दिए कि कही गलती से मुझसे दोबारा मुलाकात ना हो जाए....वो सारे रंग जो मुझे नज़र आते हैं.......मुझे मालूम है तुम्हें भी दिखते हैं.....क्योंकि वो सारे रंग उतना ही तुम्हारे करीब है जितना मेरे.....क्योंकि वो सब तुम्हारे भी चारों तरफ है जो कुछ मेरे अंदर और भीतर.....तुमने उस नीले रंग को उखाड़ फेंका क्योकि वो मेरे ख्वाहिशों के आसमां का एहसास कराता है.......वो सारे हरे रंग निचोड़ दिए क्योंकि वो मेरी हसरतों के गलीचों की याद दिलाते हैं.....तुम वो सुर्ख और पीले मेपल के पत्तों सा रंग भी अपने आस-पास नहीं रखना चाहते.......क्योंकि वो कभी न कभी तुम्हें ले जाते है......मेरे साथ उन्ही गलियारों में....जहां से तुम मेरे साथ गुज़रना नहीं चाहते....वो लाल रंग तुम्हारे गुस्से को दिखाता है.....लेकिन तुम तो कूल दिखना चाहते हो......क्योंकि तुम्हें तो सबको ये बताना है कि तुम पर कोई फर्क नहीं पड़ता....हां कुछ ऐसा ही चाहते हो तुम....लेकिन लाख कोशिश कर लो कुछ नहीं कर सकते ....वो रंग इस कायनात के हैं....जा ही नहीं सकते.....तुम एक ब्लैक एंड व्हाईट ज़िंदगी बसर नही कर सकते....क्योंकि ये रंग तो मेरे फेवरेट हैं.....फिर तुम्हारे फेवरेट कैसे हो सकते हैं....यकीनन तुम्हारे लिए नहीं बिल्कुल नहीं ....क्योंकि तुम तो उस काले रंग की मेरी परछाई से भी दूर जाना चाहते हो....और मैं तुममे वो सारे रंग दोबारा भरना चाहती हूं....जो तुम चुपके से बिन बताए चुरा के ले गए......और ले गए.....मेरे सारे रंग,कूंची और वो रंगीन प्लेट.....जिसमें तुम्हें देखते ही ना जाने कहां से रंगो की बरसात हो जाती थी.....मैनें कभी रंग खरीदे नहीं सिर्फ तुम्हें देख लेने भर से.....भर जाती थी मैं रंगो की उस चमकीली दुनिया में.....इसलिए आज तक ये आसमां मुझे नीला चमकीला....घास के मैदान..हरे से.....और यूंही रंग बरसाते आबशार बरबर ही खींचते हैं.....क्योंकि मुझे अब भी नज़र आता है.....तुम्हारे बाहर निकलते ही ....तुम्हारे साथ-साथ चलने वाला एक इंद्रधनुष जिसमें तुम्हें रिफ्लेक्ट करते सारे रंग एक साथ दिखते हैं.......बिल्कुल ऐसा जैसे तुम रंगो की खान .........कौन सा रंग बताऊं तुम्हें कि कौन सा फबता है.....तुम्हारी वजह से तो वो रंग मुझे अज़ीज हो जाता है....मेरा मन गमक जाता.....उसी रंग को पाने के लिए मचल जाता है.....मुझे रंगो की रंगीनियों में शराबोर होने का मन करता है......बिल्कुल उस चमकीली पतंग की तरह....जो तुम्हारे घर की छत से उड़ाने पर पहाड़ों और हरियाली के बीच अपने अनूठे रंगों की पहचान अलग से बनाती इतराती और इठलाती फिरती होगी.......और....पता नहीं और भी बहुत कुछ पता नहीं कितने रंग.....सब तुम्हारे संग.....ऐसे नहीं.....जैसे मैं .......बेरंग.....एक बार फिर वापस वो सारे तुम्हारे इंद्रधनुषी रंग.......मेरे लिए...तुम्हारे लिए

Friday, January 30, 2009

क्योंकि तुम....

हां......तुम और तुम्हारा साथ....
सिर्फ ये ही अच्छा लगता है....तुम्हें भी तो सब पता है....मुझे क्या-क्या अच्छा लगता है......मेरे अनगिनत सपने और उन्हें तुम्हारे साथ पूरा होते देखना......ये भी अच्छा लगता है....तुम...तुम्हारा साथ....तुम्हारी याद...सबकुछ......हां वो सबकुछ अच्छा लगता है....तुम्हारे साथ साए की तरह रहना.....तुम्हारे साथ सफर करना......तुम्हारे साथ-साथ चलते मंज़िलों को छूना......अपने यानि हमारे.....चाहें अलग ही सही....सपनों को पूरा होते देखना.....बहुत अच्छा लगता है....।

तुम्हारे पंखो का साथ.......तुम्हारे रंग.....तुम्हारी नर्मी......तुम्हारी गर्मी.......तुम्हारा साया.......तुम्हारी आवाज़.....तुम्हारी नमी देने वाली जड़ों के साथ खुद को खिलते हुए देखना....तुम्हें पता है तुम मुझे कितने और क्यो अच्छे लगते हो......शायद मुझे मेरे वजूद से ज्यादा पहचानते हो....मुझे मुझसे ज्यादा जानते हो.......फक्र होता है मुझे तुम पर.....अपने आप पर.......क्योंकि तुम मेरे हो

तुम्हें भी मुझमें कुछ तो अच्छा लगता है......लेकिन,मुझे तुम्हारे जीने का अंदाज़....तुम्हारा रंग....तुम्हारा ढंग.....वो सबकुछ जो तुमसे जुड़ा है....वो सब अच्छा लगता है....जो कुछ भी तुम्हारा है.....मुझे तुम पर आश्रित होना....तुम्हारे लिए जीना.....तुम्हारे लिए मरना.....और तुम्हारे लिए ही जीने का सुरूर पैदा करना अच्छा लगता है........तुमसे अलग और तुमसे अच्छा.... कुछ और लगने के लिए ज़िदगी में जगह ही नहीं नज़र आती.......

तुम उस अनंत आकाश की तरह.....जिसकी तरफ मैं फक्र से सर उठाकर देखती हूं.........तुम्हारे आगोश में आने के लिए बेकरार.......तुममें समाहित होने को बार-बार और हरबार कोशिश करती हूं ........ऐसा लगता है वो सारे तारे जो तुम्हारे आगोश में समाए नज़र आते हैं......शायद मेरे लिए ही सजाए गए है.....इसलिए भी तुम अच्छे लगते हो.........

तुम समंदर में गहरे बैठे उस सीप की तरह..जिसके भीतर का मोती मैं पाना चाहती हूं और तुम्हें पाने को गहरे उतरती हूं......तुम्हारी सहजता और तुम्हारी उन्मुक्तता मुझे पागल बनाती है.....शायद इसलिए भी.......मेरे हर अरमान को तुम समझते हो........तुम्हारी एक सोच भी मुझे दमका जाती है........क्या तुम्हें नहीं मालूम तुम्हारे अंदर की रौशनी में मैं अपने आपको सबसे सहज तरीके से खोज पाती हूं....

तुम और तुमसे अलग कुछ भी नहीं.......तुम्हारी हर वो बात जो तुम मुझे अक्सर बताते हो....कभी मुझे बताने को कभी समझाने को ........एक-एक हर्फ मेरे ज़हन में छपता है........लेकिन तुम्हें कभी नहीं बताती......क्योंकि अक्सर कही हुई बातें समझ नहीं आती........औऱ बिन कहे सबकुछ समझते चले जाते हो............

तुम नहीं बताते अपने बारे में.........ना अपनी अभिव्यक्ति और ना अनुरक्ति........तुम बहुत गहरे उतरते हो.....जब उतरते हो अपने समंदर में......लेकिन अकेले.....बिना मुझे अपने साथ लिए.....लेकिन तुम कहीं भी हो........मुझे समझ में आते हो.......पर्त दर पर्त बिना खोले भी मेरे साथ बिताए एक एक सहज़ लम्हें मैं तुमको समझ पाती हूं.....मुझे तुम अच्छे लगते हो क्योंकि... मेरी गहराइयों को तुम समझ पाते हो.......मैं सिर्फ तुम औऱ तुममें समाना चाहती हूं........तुमसे अलग नहीं.....तुमसे दूर नहीं......तुम्हारे बिना नहीं......सिर्फ तुम्हारे साथ और तुम्हारे संग.........तुम....तुम औऱ सिर्फ तुम शायद शब्द कम पड़ते जा रहें हैं.......लेकिन तुम्हारे लिए मेरी कोशिशें नहीं.......