Thursday, November 24, 2011

बस नदी हो जाना .....


नदी का सपना...
नदी को पाना
अब जैसे कुछ भी करना...
बस नदी हो जाना .....
नीम बेहोशी खुशियां...
जागते सोते गलतफहमिया....

एक अंजुरि नदी मेरे भीतर ......
हर पल कुछ कहती है,,,
सुबह अब हर रोज़ होती है....
हर पीछे छूटी रात की तरह...
और नदी भी आवेग देती है...
मेरे भीतर बहते प्रवाह की तरह.....

नदी को पाकर.....क्या ........
तलाश खत्म....फिक्र खत्म....
जैसे जिंदगी भी खत्म
किसी की जिद नही ....
कोई कसमसाहट नहीं...
बस एक खिलखिलाहट ..
कल...कल
मेरे भीतर....!!

Monday, November 7, 2011

एक मुक्तिबंधन !!


तुम प्रेम करते हो..
पर क्यों तुम्हारा प्रेम
वाणी से वंचित रहता है
कई पर्दों के ज़रिए..
उस पर पर्दा रहता है
जानती हूं
मौन की भाषा होती है...
लेकिन कब तक
कोशिश जारी रखूं...
उन अनगढ़ शब्दों को
स्वयं तराशती रहूं....
प्रस्तर खंड बनकर....
जब्त करती रहूं...
इंतज़ार कब तक हो..
तुम्हारे मौन के टूटने का
संसार को रचने का...
चाहिए
एक मुक्तिबंधन...!!