Thursday, October 20, 2011

शुक्रिया ज़िंदगी...





कहते है अकेले रहो तो सोच समझ के सोचो
और भीड़ मे हो तो सोच समझ के बोलो......
अकेले रहना भीड़ मे रहने से ज्यादा खतरनाक होता है....
जहां बोलना ....
उम्रभर का इंतज़ार करता है
और
सोचना जैसे.....
बुनियादी जरुरत बन जाता है...
ये सोच कितने लाख हजार सवालो के जवाब अपने आप देदेती है
बिन मांगे...बिन कहे...
ना मालूम हर बार ख्वाहिशें...
ख्वाबो की तरह क्यों रफ्तार पकड़ती हैं
हर बार एक नयी शक्ल अख्तियार करती है
अब यकीं बढ़ गया है अपने आप पर
अब कुछ धुंधलाता नही
सब शफ्फाक....
अब अपनी शिनाख्त खुद ही कर लेती हूं
सही या गलत
सब मेरा
कल भी आज भी
सब कुछ मेरा
जरुरतें जो पूरी नही हुईं......
शायद एक्सटिंट हो गयीं हैं
सपनो ने जिंदगी को एक रफ्तार दी....
हर बार एक नयी उर्जा के साथ....
जिंदगी के किसी हिस्से से कोई गिला नही....
तुमसे भी नहीं...

शुक्रिया ज़िंदगी !!

Sunday, October 16, 2011

सिर्फ एक बार.....


आओ..
बैठो..
देखो..
झांको भीतर इस मन के...
यहां ताप है,महक है...
इंतज़ार है..
एक बार
सिर्फ एक बार..
इतिहास के बदलते आवर्तन में...
ठहरे हुए इस वक्त को..
इतिहास बनने दो..