Friday, February 19, 2010

तुम्हारे....मेरे लिए....

नींद मयस्सर नहीं अब मुझे...रात होती है... क्योंकि ये रात की मजबूरी है... वर्ना यूंही जागकर सोना....एक आदत सी बन चुकी है...ज़िंदगी बिताना भी...बस अब एक आदत सी है... जिंदगी के हर दोराहे पर.. कश्मकश पर...फलसफे पर.....गिरती-पड़ती.....दौड़ती-हांफती......कई ज़िंदगियों की जंग के बीच...सुनाई देती है...कुछ सन्नाटो की आहट....इक जंगल डूबा जो गहरे सन्नाटे में...बस वोही गुमा देता है इन यादो को....जीने की आदत को.... सन्नाटों की गमक को...उस हर चीज़ को जो देती आमद तुम्हारी...तुम्हारे आने की....तुम्हारी यादों की....तुम्हारी आँखो की....तुम्हारी उस एक मुस्कान की.... जिसके लिए ये ज़िंदगी भी कम इंतज़ार के लिए... पर फिर भी......इंतज़ार उस ज़िंदगी का जिन बर्फ़ बनती..रिश्तों की तासीर गुमाना चाहती हूं....क्योंकि..पता नहीं क्यों...एक गर्माहट जो तुम्हारे चेहरे से झांकती महसूस होती है...जिंदगी के एक और दिन के लिए....इक इंतज़ार के लिए और तुम्हारे ...मेरे लिए.......!!

Tuesday, February 2, 2010

तुम्हारे लिए....

मालूम नहीं....
कब तक...
मैं यूंही लिखती रहूंगी.....
इन बेहिसाब शब्दों के साथ...
अपने सपने बांटती रहूंगी...
अब तुमसे ज्यादा....
ये शब्द मुझे समझ पाते हैं....
इसीलिए..
शायद...मेरी बात...
तुम तक..पहुंचाते हैं......
कल की ही तरह...
मैं आज भी लिखती हूं...
तुम्हारे लिए....
क्योंकि.....शायद
मेरी कलम आज भी तुम्हारे पास रेहन है...!!