दिखायी देते हो तुम.....
मासूमियमत से सोते......
सिगरेट पीते....
तफ्सील से जीते....
बिना बात गमकते......
कहीं किसी सपनों में जैसे,
कभी एकदम ज़रा बाहर
किसी पगडंडी पर धीमी चाल से चलते
किसी नदी में मछली पकड़ते...
सर्द बर्फ से चेहरा धोते...
और उसी बर्फ में गर्मी से धधकते....
किसी दौड़ते वक्त को पीछे धकेलते...
कभी माराडोना तो कभी ग्रास की बात करते....
फिर वहीं नीली हरी रपटीली घास पर फिसलते
क्यों सपनों से बाहर नही जाते
वापस हर बार धीमी रफ्तार के साथ
मेरी रगो में बारंबार..
गुमराह करती राहों में ....
खो जाते हो मेरे ही साथ
मेरे अधूरे-अबूझे सपनों की दिशाएं
कभी कभी (मैं)दिशाहीन जैसे भी....
रात को दिन और दिन को रात बनाती जैसे...
और उसी में तुम....
तुम्हारी उन्नीदीं भारी पलकें
मुझे और दिशाहीन बनातीं....
कहां चला जाता है....
मेरे चारो तरफ का जीवन
कहां छुप जाता है....जीवन का यौवन
सपनो के बीच...
जबतुम दिख जाते हो....
बस आ ही जाता है ...
तुम पर और खुद पर
बस प्यार .........!!