Tuesday, March 30, 2010

मालूम नहीं....

मेरे घर के सामने खड़ा..
नीम...
रोज़ जल जाता है,
हां....
नीम का ये पेड़ कट-कट कर,
गिर जाता है...
कई मर्तबा ....
पत्ते जब रफ्ता रफ्ता गिरते हैं..
ये जिया भी उसी के साथ...
कहीं गुम जाता है....
टेढ़ी मेढ़ी सी ये सड़कें
नज़र आती हैं आजकल..
हल्के पीले..भूरे...सूखे पत्तों से
लबरेज़ ..पर,
हरा पन नहीं दिखता..
दूर दूर तक नहीं.
गुम गया है...जैसे मेरा भी मन
पहाड़ों के पार से आती और
मेरे अहाते में बिछती धूप
टोह लेने आती है..पर
अब गर्माहट नहीं सुहाती
ये मन बेचैन ....
बूंदो के लिए...
भीगने के लिए....
हरेपन के लिए
कब बीतेगा ये मौसम
सूखा...सख्त...गर्म मौसम
झुलसाने वाला...जलाने वाला
कब बरसेगी फुहार...
कब थमेगी
कब तक थमेगी...
बैराग पैदा करती ये बयार...
मालूम नहीं....

Friday, March 26, 2010

सिर्फ एक बार....!!

इस बार फिर.....चोट लगी है.......
ह्रदय पर...
आघात ..वेदना...तड़प...आंसू....गम...
ये सारी बातें बेमानी सी लगती हैं अब....
सुन्न हो चुका हो....मेरा मन ....
जैसे लकवा ......मार जाये ....
अपाहिज..
किसी को कर जाये...
जीवन के झोल में उलझने के बाद...
तलाश ज़ोर मारती है...
मां का आंचल ...
दूर कहीं जलेबी के लिए
जिद्द करता सा...
उलझन नहीं सुलझती
तलाश करती है
उस जिया की
जो मां की ही तरह.....
पोषित करता पल पल
जिसकी छांह में
मिलती ठंडक .....
किसी विशाल वृक्ष की.......
पर मानो
मेरे लिए कोई वृक्ष नहीं....
कोई छांह नहीं .....
और ये धुप मुझे जीने नहीं देती
एक भंवर...कोई बवंडर...
कुछ खींच लाता है...बाहर...
इसी धुप में
मेरे साथ जलने...झुलसने के लिए....
एक मध्धम रौशनी...चांदनी....
नज़र नहीं आती...
जीने के लिए....
एक बार ...सिर्फ एक बार ...
तुम
मेरी माँ बन जाओ......
सिर्फ एक बार मुझे छांव दे जाओ.....
सिर्फ एक बार....!!

Friday, March 19, 2010

पूरे चांद की रात.......

लड़की बड़ी ही बेकल...पूरे चांद की रात...फागुन का महीना और उसका साथ...
(कोई नहीं जानता जब वो खुश होती है तो उसके भीतर एक आबिदा गुनगुना रही होती है )
नहर किनारे चलते चलते वो रास्ता यूं पार किया मानो...
सुर्ख फूलों का कालीन और हरे खेतों की बिछी चादर....
फिर पहुंचे... तो जंगल...पहाड़...नदी का मुहाना और चंद अजनबी...
अजनबी सिर्फ लड़की के लिए...लड़के के लिए मानों दूसरा घर....
जंगल में.... नदी के मुहाने...रंगो के बहाने.... उन अजनबियों के बीच...
चंदा को अपनी बांहों में लिए जाने का सपना संजोए....
बड़ी संजीदगी से फागुन का रस ले रही थी...वो...
जिसमें ज़मीन से लगे कुछ पीले फूल...केले के पौधे पर खिल रहा एक लाल फूल
और तमाम लाल गुड़हल के फूलो के साथ हरी घास के बीच..नदी की कल कल के साथ.....
सुर्ख रंग की तलाश कर रही थी...
बीच बीच मे लड़का आता...देखता पर समझ नहीं पाता....
तुम ऑड वन आउट क्यों रहती हो....
नहीं कुछ नहीं ...बस थोडा असहज हो जाती हूँ...अजनबियों के बीच ....
(इतने अजनबियों की मुस्कान भी राहत नहीं दे पाती है....)
पर मन ही मन सोचती...
( हाँ ....शायद तुम समझ नहीं पाते .....मैं समझा नहीं पाती....)
पर कहा नहीं..
उसने पूछा...मेरे साथ चलोगे...उस झरने के मुहाने तक...
नहीं तुम रहने दो...तुम्हारे बस की बात नहीं...
नहीं...एक बार....बस तुम्हारे साथ तो कहीं भी...
नहीं कहा ना...रहने दो...
अच्छा ठीक....फिर गुस्से से सोचा....(यू ऑल्वेज़ अंडरएस्टिमेटेड मी....)
पर कहा कुछ भी नहीं....
सिर्फ एक मुस्कुराहट...
फिर दूर नदी के मुहाने ....शांत सी जगह में कुछ अपने लिए नज़र आया....
जहाँ से दूर-दूर तक दिख रहा था...
लहरों ...पत्थरों का ताना बाना.....
क्षितिज, पहाड़ों की एक नितांत सीमा
जहाँ से सूरज की किरणे....रोज़ सुबह .... आती होंगी ,
उसके टेंट में ....इस घास के मैदान में....और इसी गंगा के पानी में ....
गुड़हल हो या पलाश के फूल....
सभी को सींचती है....
पर शायद वो कहीं खो सी गयी थी
वो नदी के किनारे .....प...से पानी...प से पेड़ .....प से पलाश की तलाश कर रही थी
क्यूंकि उसकी प से प्यास बढ़ रही थी...
वापस आने पर लड़के ने पूछा कहाँ गयीं थीं ........लड़की ने कहा पलाश बीनने...
क्या...नदी किनारे,,,पत्थरों के बीच पलाश ...पागल हो क्या....
तुम नहीं जानते मुझे हर जगह पलाश दीखते हैं...बस चुन नहीं पाती ...
मेरे साथ चलोगे पलाश बीनने.....एक बार
gone केस.....
फिर ....
लड़का अपनी दुनिया में...अपने दोस्तों में....अपने में....अपनी बोतल के साथ....जिसे वो अपना पानी कहता....
क्योंकि उसमें उसका साथ देने वाली वोडका मिली थी...
मुझे भी चाहिए....तुम्हारा पानी.....दो घूंट...
दो ..दो के बाद चार फिर छह घूंट....
लड़का कहता है...डोंट हैव इट मोर....आए डोंट वांट टू हैंडल यू.....
एक बार फिर...गुस्सा....ठीक है..
(यू ऑलवेज़ अंडरएस्टिमेट मी...आएम नॉट ए किड....इवन आए वांट टू हैव इट.....
यूं डोंट नो....वट आए वांट टू हैव ऐवरीथिंग विद यू.....)
पर कहा कुछ नहीं....
सामने जल रही आग....कुछ सूखी लड़कियां....जंगल के बीच...अजनबियों के बीच......
हां लकडियाँ सुलग रही थीं....बनती बिगड़ती बटोही सी.....
पर उसके मन की गिरह कहीं भटक रही थी...
पर फिर भी वो उदास...अपने मन के साथ.....अजनबियों के बीच....
बीत रहे पलों को हल्का बनाने की कोशिश में. थी ...
उस उदास पूरे चांद की रात में...
उन लकड़ियों से उसका मन उजास नहीं हो पा रहा था....
कुछ जल रहा था भीतर....जिसका सेंक उस तक नही पहुंच पा रहा था....
उस पूरे चांद की रात में....पास बहती नदी की कल कल....करती धार...
रात होने का एहसास जगा रहे झींगूर.......सामने एक के बाद एक दम साधे बैठी चट्टानें....ही
सिर्फ उसके मौन की साक्षी बन पा रही थीं....
और पास बैठा रांझा..
कमबख्त यही मौन तो है जो उसके उजास जिया को काला किए बैठा है...
जहां छायी अमावस छंटने का नाम नही लेती और एक बार फिर य़हां भी....
वो ही सब....जिसे दूर करने वो शहर से यहां तक आयी पर....
पर वो उदास चुनरी भी उस के साथ साथ चली ही आयी....
फिर अगले दिन...रंगो का त्योहार....
वो चाहकर भी टैंट से बाहर नहीं निकल पायी...
लड़के ने पूछा ....क्यों होली नहीं खेलनी...
(शायद तुमने पूछा ही नहीं....अकेले ही तो गए थे होली खेलने)
नहीं मैं खेलती नहीं.....
(फिर मन में कहा....रंग रूठ गए हैं.....मेरे साथ मिल नहीं पाते....)
उसने सोचा शायद रंग खुद चल कर आया है....कुछ पलों के लिए
पर लड़का वापस लौट गया.....अपनी रंगीन दुनिया में.....
पलट कर नहीं देखा....कुछ नही पूछा.....बस वहीँ एक इंतज़ार में....
वो रंगहीन टैंट ....उस उदास दोपहर के उजाले के साथ.....
जिसमें उजाला कही नही था.....
रंगो का इंतज़ार रहा पर रंग नहीं आए...
सुबह गयी...दोपहर भी थक गयी
पर उसकी आंखो से उबलते झरने में भी किसी को कुछ नज़र नही आया.....
जाने कैसी जिंदगी..थकी सी....बेरंग सी....
एक ही तो रंग उसका....
पर वो भी उससे दूर...
अजब दुनिया थी वो...चारो तरफ से प्रकृति के रंगो से भरपूर....
पर जिंदगी के रंगो से दूर...
बढ़ती धड़कनो की तरह...वक्त भी बढ़ता जा रहा था...
शायद मियाद खत्म हो रही थी...
हाँ ...वापस जाना था....भीड़ में
पर वो जाते जाते...बस मुट्ठी भर रंगो को अपने साथ ले जाना चाह रही थी....
उसने बाकी बचे रंग अपनी मुट्ठी में भर लिए..
लड़के ने पूछा...होली तो खत्म...अब क्यों
उसने देखा...सिर्फ हंस दी ....
(और सोचा ..शायद तुम नही समझोगे.......बचे हुए रंग जज्ब करके रखना चाहती हूं....शायद अगले फागुन के लिए...पहले से ही.....शायद चंदा को तकते तकते......पलको में इन झिलमिल तारो को बसाते...वो फागुन जल्दी आ जाए और मेरे रंग भी ले आए...अपने संग...जिससे तुम्हें रंग सकूं...)
पर कहा सिर्फ इतना ही....तुम्हारे लिए .....सिर्फ तुम्हारे लिए .....
लड़का बस देखता रहा...समझ नहीं पाया
आए डोंट वांट टू अंडरस्टैंड यू....डू वॉटएवर यू फील लाइक....बट डोंट टैल मी....
लड़की बंद पलकों में अपने सपने भरती है और कहती है...
(मेरे रंग ....मेरे से नहीं..जाने कब रंग मिले अब...)
वो सारे घने दरख्त...वो सारे शफ्फाक उजाले...कई रातों से भी गहरे वो अंधेरे....रंगीन राहो के साए...
वो तमाम चीज़ें जो वहां की पहचान नुमायां कर रही थीं,,,
सब बस पलको में समाती जा रही थीं....
वो लड़की उन बांहो के साए के साथ ...जिनके साथ साथ वो आजादी से चल रही थी ..
अपनी धड़कनो को महसूस करते....जंगल से मिलती जुलती याद की ही तरह...
पर रंगो की हसरत लिए...बेसबब वापस लौट आती है ....
अगले फागुन के इंतज़ार के लिए....
रंगों के लिए....
लड़का खुश है ...बहुत खुश.....
कुछ नए रंग थे....
शायद .....!!

Thursday, March 11, 2010

पता नहीं क्या....पर सबकुछ मेरा....

चितचोर जैसा नाम...देखी....बूझी सी कुछ अच्छे सिनेमा की सनद जैसा....बिसारी सी बातें याद कराता...जाने कैसे जुझारु मन की गांठ खोलता....लाख कोशिश कर लो...बिना जाने बिन पहचाने एक लफ्ज़ बाहर नहीं निकालने का....बातें करना क्यों अच्छा लगता...कोई बुझा नहीं पाता...बहुत जुझारु..बहुत ज़ोर....बिना आंख तरेरे जो ज़बान से इक शब्द निकाले तो जान मार दे....उसी की तस्वीर को बुहारने जैसी कोई नया सिनेमा होता....आंख के आगे से पर्दा हटने नहीं देता......सिनेमा के रंग अजीब...कई बार जैसे इंद्रधनुष के रंगो से भी अलग....बडे ही सतरंगी...मनरंगी....कई कई हज़ार मील बसाते....कही दूर ले जाते...मन काहे ना मानता...ना मानने की ही जिद्द करता....इक धड़कन थामती....तुम्हारी आवाज़....बड़ा ज़ोर लगाती....समझाने..बुझाने...दुनिया दारी समझाने ....पर अबूझमाड़ के जंगल सी ये दुनिया...समझने को जी ही नहीं करता....ना मानता....ना बूझता...इक रंगीली दुनिया का ककहरा सीखती....सांस कभी फूलती...और कभी दम घोंट जैसे मानों रुक ही सी जाती...भार नहीं उठाया जाता.... झूठा ....समझने के ढोंग करने जैसा....मैं जैसी...वैसी ही मरना चाहती.....दुनिया में झूठे जीने के कशमकश के बीच....रेशम से फिसलते महीन सपनों को बुनते रहना....सिर्फ बुनते ही रहना...तुम्हारा साथ पा जाती तोभी और फिसल भी जाती तो भी अपने को झाड़ पोंछकर संवार लेती....पर सपने बड़े सुनहरे....रंगीन तागों जैसे...फंसाते और एक सूरज दिखाते...एकदम झक्क सुनहला....पर एक अलग सी फंसाने जैसी बुरी सी दुनिया....तुम्हारी दुनिया....तुम्हारे साथ के नाम...चंद नाम जो बताते....फलां ज्यादा ज़हीन...पढ़ा लिखा...सेक्यूलर....धर्म,..... अध्यात्म पर बहस कर सकने वाला..... कितने अजीब से लगते ये नाम...लोहिया... नक्‍सलवाद...जयप्रकाश, मंडल...लेनिन...मार्क्स... माओ,चे...और भी पता नहीं क्या क्या.... ये और माओवादी ओफ्फ....जाने क्या खाके पैदा हुए....वो इस दुनिया के नहीं....कम से कम ...सिनेमा....इल्यूज़न....कहानी....कविता....मेरे इश्क की दुनिया के तो बिल्कुल भी नही.....उन्ही खोयी...अबूझी शक्लों में....आज को तलाशने की कोशिश तो पूरी करती हूं....पर मन माफिक नहीं....गंदी कसैली शराब के स्वाद जैसे ये नाम.....जिन्हें ढूंढने के बाद अब भी बहुत कुछ उन्‍हीं शक्‍लों में खड़ा नज़र आता है जहां आज से पचास साल पहले उसका खड़ा होना साहित्‍य में मुक्तिबोध में दिख रहा होगा.....बड़ी अबूझ पहेली सी है ये दुनिया....जिसकी सनद मेरी आंखों से देखना चाहते हो....नहीं अच्छी लगती....मेरी जान निकलती है......ऐसा जैसे...पुरानी दिल्ली से किसी की यारी...कमबख्त...कहीं गहरे जमी जैसी....खुरेचना भी चाहों तो पर्त दर पर्त....किरचें उधड़ती जाएँ....पर दाग ना छूट पाएं..वो जो गहरे बस जाते...कभी निकल भी ना पाते...कभी कभी पागलो की तरह दिमाग में फतूर घूम जाता....बवाल सा....तुम एक बार मेरी मां बन देखते....क्या देख पाते जख्म..डर....या समझ जाते....इश्क की कैफियत.....ना...डर कर शायद मेरी मति मारी जाती...उलट सुलट सोच जाती ....तुम मां भी नहीं...मेरे बाप भी नहीं...मेरे भाई भी नहीं....पर पता नहीं वो भी तो नहीं....जो मैं देखती....कभी नहीं कहा...पर आज बताने को जी कर गया सो ...सुन भी लो...दुनिया के सारे बुज़ुर्गों से मुझे बढ़ी कैफियत बरसती लगती...ना जाने क्यूं हर शक्ल में अपने बाप की शै तलाशती थी....अब नहीं...अब लोग अच्छा लगना बंद हो गए है....अब कोई नहीं दिखता....पर दुनिया के झोल समझते समझते...सांझ बुहार जाती....कमबख्त दुनिया समझ नहीं आती...दूर किसी और दुनिया के उस छोर से भागने का मन करता..तुम्हारे साथ अपनी दुनिया में रहने का मन करता.......बस और कुछ नहीं.........क्यों...क्या...कैसे...कब...कहां की दुनिया से दूर....बहुत दूर...किसी जंगल में जाके खो जाने जैसा....किसी नदी में डूब के वहीं बस जाने जैसा....किसी हवा में उड़के कहीं दूर उड़ जाने जैसा.....पर तुम्हारे साथ....