Sunday, December 13, 2009
शब्द....
मुझे शब्द चाहिए उसके.....कुछ उनींदे....खोए....खामोश.....पर उसके इश्क़ से लबरेज़ शब्द.....हर बार की इस कोशिश मे मुझे मालूम नहीं कि ये सारे शब्द कहां जाते हैं....पर उम्मीदों का दामन थमता ही नहीं.....एक निरंतर...कभी ना खत्म होने वाली प्रक्रिया की तरह बस अनवरत चलता रहता है......मैं रचना चाहती हूं....अपने शब्दों का संसार...उसके साथ.......वहीं...जहां अक्सर मैं कुछ खोजने जाती हूं....अपने अंदर के छूटे हुए शब्दों की तरह....अपनी हद तय नही करना चाहती.....आसमान को और ज्यादा ऊंचा कर देना चाहती हूं.....वो कहता....मैं....बहुत बड़ा है मेरे अंदर का....मै अक्सर उस मैं को भी खोजने जाती हूं....मैं अपने मैं को कम कर देखना चाहती हूं.....और अपने इश्क़ को और बड़ा होते देखना चाहती हूं.....पर बहुत कुछ चाहती हूं.....
Thursday, December 3, 2009
कुछ भी तो नहीं पता....
ऐसा लगता ही नहीं कि जिंदगी से रंग उड़ गए हैं.....कभी कभी काली-सफेद उदासियों के बीच से सतरंगी हसरतों ने तमाम दबाब के बावजूद अपने हक़ की छाप छोड़ी है..... हां कई दफा..... ज़िद... तौहीन... ज़िल्लत...कसमसाहट....कुछ नहीं बल्कि सब कुछ जुड़ने से पहले ही टूटने का एहसास.....या खुदा यहां तो नासूर से इन मर्ज़ों ने तमाम नीम-हक़ीमों....पीर-फकीर....के चक्कर कटवा दिए....पर कमबख्त ना मालूम कहां से ये नामुराद इश्क़ अपनी ज़ड़ें कहीं गहरे जमा करता चला गया....जो अब पेशानी पर पड़ने वाले बलों के साथ सिकुड़ती आंखों से नज़र ही नहीं आतीं....ये इश्क है...या फिर इश्क में ही डूबे रहने का मोह...या फिर कोई नाफिक्री ज़िद्द.....कभी नहीं....कोई नहीं समझ पाया.....एक जोश...जोश की तलाश....क्या करुं...उसका जौहर कहीं का नहीं छोड़ता कमबख्त....मेरी खोयी सांसों में रवानगी की बयार पैदा करता....इस दुनिया-जहां की फिक्र को पीछे रखता...बड़ी अदावत के साथ अपनी सांस बुलंद करता.... यूं तो बदमिज़ाज़ी के किस्से ना सुने....ना जाना....पर सिर्फ सुना....एक बदमिज़ाज लड़की......अब अच्छा सा लगने लगा है.....ज़िंदगी मानों बड़ी तफ्सील से जीने की लत पड़ गयी है...ये इंतज़ार ऐसा....जिसने इफ़रात में वक्त का दान दिया.....ना कोई हड़बड़ाहट....ना कोई चौंकना.....ना आगे बढ़ना...ना पीछे छूट जाने का ही अफसोस....एक गज़ब विस्तार मिलता जाता है...हर मोड़ पर....सांसे भी तो पहचान कर चुकी हैं...कब थमना है...कब डूबना है...और कब कलेजे को चीरते बस बाहर ही निकल पड़ना है......सांसों का बढ़ना,थमना,डूबना...कसकर एक दूसरे के आवेग को थामना... मानों जैसे कुछ पीछे छूटता जा रहा है...कुछ कहना था...शायद शब्द कम पड़ गए......कुछ रह गया....हां शायद कुछ देना भी तो था...बस हाथ थामने की मियाद खत्म हो गयी......कुछ अटपटा सा होता जा रहा है...पर क्या.....कोई नहीं बता पाता....मेरे अंदर मचती उथल-पुथल......कहीं मुझे कुछ कर गुज़रने से रोकना चाहती है......मेरे सपनों को वो सतरंगी ग़लीचा बस उठाए सा घूम रहा है....कहां जा रहा है...कहां जाना चाहता है....कुछ नही पता....कुछ भी नहीं पता........
मैं कहां जा रही हूं....मेरे सपने...मेरी अकुलाहट......
हां एक अच्छी नींद का भी इंतज़ार........