Friday, October 30, 2009

तुम हो...

मेरा सावन भी तुम हो...मेरी प्यास भी तुम हो....
सहरा की बांहो में छुपी...वो आस भी तुम हो...
तुम यूंतो बहुत दूर हो मुझसे....पर
एहसास ये होता है....मेरे पास भी तुम हो....
हर ज़ख्म के आगोश में है दर्द तुम्हारा.....
हर दर्द में तस्क़ीन का एहसास भी तुम हो...
खो जाओ तो वीरान सी हो जातीं हैं राहें....
मिल जाओ तो फिर जीने का एहसास भी तुम हो....
लिखती हूं तो तुम ही उतरते हो कलम से....
पढ़ती हूं तो लहज़ा भी तुम हो.....
मेरी आवाज़ भी तुम हो....
क्या कहूं...क्या तुम समझ पाते हो....कि तुम क्या हो....