Monday, December 29, 2008
क्या खोया क्या पाया
क्या खोया क्या पाया....ये सवाल तो बहुत बड़ा है लेकिन फिर भी ये जानने की थोड़ी -बहुत कोशिश मैनें ज़रुर की है.....अगर साल के शुरुआत से याद करना शुरु करें तो बहुत सारे लोगों को हमनें खोया जैसे-फरवरी में हॉलैंड में 91साल की उम्र में महर्षि योगी....94 साल की उम्र में बाबा आम्टे...96 साल के जस्टिस एच.के खन्ना और इन सबके अलावा रंगकर्मी शीला भाटिया हमारे बीच नहीं रहीं...अप्रैल में शरन रानी......फिर मई के महीने में मशहूर गांधीवादी निर्मला देशपांडे.....जून के साथ ही फील्ड मार्शल सैम मानेक शॉ हमारे बीच नहीं रहे.........उसके बाद जुलाई में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायधीश यशवंत चंद्रचूड़ा और उसके बाद मशहूर उद्योगपति केके बिरला औऱ उनके बाद महाभारत को एक नई तस्वीर देने वाले बी आर चोपड़ा भी अंतत चले गए।
इस पूरे साल में हमने बहुत कुछ झेला,बहुत कुछ बर्दाश्त किया और साथ ही बहुत कुछ पाया भी.....आना और जाना तो एक शाश्वत नियम है ,लेकिन अगर ये सब एक त्रासदी या दुर्घटना के रुप में हो तो शायद कोई भी याद करना पसंद ना करे लेकिन फिर भी जो कुछ भी होता है वो हमारे जैसे लोगो पर ही होता है.....इसलिए उसे बर्दाश्त भी अगर हम मिलजुल कर करें तो शायद दर्द कुछ कम हो.......इसी साल हमनें कई भयानक मंज़र देखें हैं जिनमें सबसे भयावह रहा बिहार में बाढ़ का कहर.....कोसी का नाम सुनते ही दर्द भरा मंज़र जीवित हो जाता है और सबसे ज्यादा अफसोस इस बात का हुआ कि इस त्रासदी के दौरान भी नेताओ ने अपनी राजनीति नहीं छोड़ी ....जहां लोगों को रोटी,कपड़ा और सर के ऊपर छत नसीब नहीं थी वहां पूरी-हलुवा बंटवा कर अपने वोट पक्के करने चाह रहे थे...जगह -जगह राजनैतिक पार्टियो के स्टॉल्स लगे हुए थे...जो अपने ही तरीके से अपनी पार्टी का प्रचार कर रहे थे....इसके अलावा हिमाचल प्रदेश के नैना देवी मंदिर में भगदड़ मची.....करीब 150लोग इसमें मारे गए......राजस्थान के जोधपुर में चंडीदेवी मंदिर में आपाधापी में भगदड़ हुई करीब 250 से ऊपर लोग इसका शिकार हुए..... साथ ही नंदीग्राम और सिंगूर जैसी घटनाएं हमारा सर शर्म से झुका देने के लिए काफी थीं।
इसके अलावा कई अलग तरह के रिकॉर्डस भी बनते नज़र आए....मई का महीना इतना गर्म नहीं रहा,अजीब था कि मई के महीने में उतनी गर्मी नहीं थी जितनी हमेशा ही होती है.....मॉनसून लगभग पंद्रह दिन पहले ही आगया ....लेकिन ग्लोबल वार्मिंग आज भी बहुत लोगों के लिए अन्जान चीज़ है।
बड़ी-बड़ी कामयाबियां भी इसी साल हमारे नाम हुईं.....हमनें चांद पर अपना झंडा फहराया....एटोमिक डील फायनल हुई तो कश्मीर घाटी ने अपनी पहली रेल देखी.....इसके अलावा कश्मीरी पहली बार इतनी बड़ी संख्या में वोट डालने आगे आए...जम्हूरियत के आगे फीका पड़ा डर और शायद बीस साल बाद ये पहला मौका था जब इतनी बड़ी संख्या में लोग सामने आए.....और नेशनल कांफ्रेस के उमर अब्दुल्ला सर्वसम्मति से नेता चुने गए.
दुनिया चाहें जैसे चलती रहे लेकिन ब्लू लाइन बसें अपना कहर बरपाती रहीं और मासूम लोगों की ज़िंदगियां लीलती रहीं....इस बीच उड़ीसा के कंधमाल में एक बार फिर बेचारे ईसाई-समुदाय को निशाना बनाया गया.....एक नन का बलात्कार कर हिंदुवादी संगठनों नें अपना सीना चौड़ा किया.....एक के बाद एक खून का नंगा खेल खेला गया....... नन को दिल्ली आकर प्रेस कांफ्रेस करके अपनी आपबीती बतानी पड़ी लेकिन नतीजा शायद आज तक नहीं आया......
सेन्सेक्स.....बड़ा ही बुरा हाल किया इसनें....अच्छे-अच्छों को हिला दिया.....मंदी की मार ऐसी शुरू हुई कि रुकी ही नहीं और कितने ही लोगों की नौकरियां निगलने के बाद भी मंदासुर का आतंक कम नहीं हुआ......अमेरिका जैसा वट-वृक्ष ऐसा हिला कि आसपास सभी को लील गया.....
हां,लेकिन इस बीच अमेरिका ने इतिहास बनाया...पहली बार कोई अश्वेत राष्ट्रपति के पद पर पहुंचा....वाकई बराक ओबामा ने इतिहास लिखा और बहुत अच्छा लगता है जब आप अपने सामने इतिहास बनते देखते हो या इसका हिस्सा बनते हो...
अगर खेल की दुनिया पर नज़र डालें तो भारत ने ओलम्पिक में एक स्वर्ण और दो कांस्य जीते,सचिन तेंदुलकर ने दुनिया के सबसे ज्यादा रन बनाने का रिकॉर्ड बनाया ......तो विश्वनाथन आंनद एक बार फिर विश्व चैम्पियन कहलाए.......जीव मिल्खा सिंह एशिया के गोल्फ चैंपियन बने.....वहीं हमनें ऑस्ट्रेलिया,इंगलैंड,साउथ एफ्रीका,और श्रीलंका से सीरीज़ जीती.......लेकिन साथ ही भारतीय क्रिकेट को दो चमकते सितारों ने क्रिकेट से अलविदा कह दिया......अनिल कुंबले और सौरव गांगुली दोनों ही अद्भुत प्रदर्शनकारी रहे......
सरकार ने पं भीमसेन जोशी को भारत रत्न देकर सम्मानित किया......तो अरविंद अडिगा ने अपनी पुस्तक -द व्हाइट टाइगर- के लिए बुकर पुरुस्कार अपने नाम किया....
इसी बीच निठारी और आरुषी हत्याकांड अब तक अनसुलझा रहा और हमारे ज़हन में हमेशा की तरह कभी न खत्म होने वाले सवाल छोड़ गया......साध्वी प्रकरण भी कुछ -कुछ ऐसी ही दिशा में जाता नज़र आ रहा है...इस प्रकरण में इतने सफेदपोश छिपे हुएं हैं कि सच का बाहर आना बहुत ही मुश्किल रहा......
हां,मगर राजनेताओं ने कोई कमी नहीं छोड़ी अपनी रोटियां सेंकने में.........इस बीच एल-18,बटला हाउस एनकाउंटर भी हुआ जिसमें हमनें अपने जांबाज़ो को खोया लेकिन उस पर भी कई सवाल खड़े किए गए और उस पर भी हर बार की तरह खूब राजनीति हुई....
इन सबके बीच हम भारतीय कभी भी संसद में हुए नोट कांड की निर्लज्जता को नहीं भुला पांएगें जिसे एक-एक भारतीय ने देखा और शर्म से निगाह नीची हुई कि देखो ये है हमारा रिजल्ट,चूंकि हमारा ही बोया हुआ है इसलिए हम ही काटेंगे....
और सबसे भयावह औऱ दर्दनाक रहा देश पर हुआ सबसे बड़ा आतंकी हमला,हमारी कूवत को ललकार कर आतंकी आए और हमें ही चोट देकर जश्न मनाकर सुकून से सो गए.....हाहाकार मचा,मीडिया को दोष दिया गया ........जिसने एक एक नागरिक का दर्द दिखाया,भारतीयता का वो जज्बा दिखाया जिसने भारत को एक कोने से लेकर दूसरे तक बांध दिया.......और नेताओं की वो कलई खुल गई.....जिससे वो हमेशा ही डरते है.......शिवराज पाटिल,आर आर पाटिल और उसके बाद विलास राव देशमुख को अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी लेकिन फिर भी मीडिया पर ही दोषारोपण किया गया.......उस पर लगाम कसने की तैयारी भी की गई........
शर्मनाक घटनाओं की फेहरिस्त अभी खत्म नहीं हुई अन्तुले साहब का नाम कैसे भूला जाए....अच्युतानन्दन जी को कैसे पीछे छोड़ा जाए...जिन्होंने नातो अपनी उम्र का लिहाज़ किया और शहीदों को कैसे सम्मान दिया जाता है..ये तो शायद वो जानते भी नहीं होंगे। और इन सबके बीच पाकिस्तान भी अपनी औकात दिखाने में पीछे नहीं रहा....हमेशा की तरह अपनी गल्ती ना मानने पर आमादा पाक का ये अड़ियल रवैया इस बार भी सबके सामने है... इन सबसे भारत-पाक के थोड़ा सुधरते रिश्तों पर फिर विराम लगा......अमेरिका ने अपना हस्तक्षेप किया औऱ पाकिस्तान ने अपने आप को चारों तरफ से घिरा पाया लेकिन अड़ियल रवैए पर लगाम नहीं लगा पाया....।
Monday, December 15, 2008
PAK-THE WORLD'S MOST DANGEROUS PLACE........
अभी हालात थोड़े जुदा थे...पूरा विश्व आर्थिक मंदी की चपेट में था और सिविल सोसायटी का ध्यान दूसरी तरफ था....लेकिन मुंबई पर पाक आतंकियों की कार्यवाई ने पूरे विश्व में पाक को सुर्खियों में ला दिया.....
हालांकि भारत और पाक दोनों ही लोकतांत्रिक देश हैं....लेकिन कभी-कभी लोकतांत्रिक खुलापन भावनाओं को भड़काने का मौका भी देता है......जिसका उदाहरण हम सबने देखा मुम्बई हमले के बाद किस तरह से बीजेपी ने भड़काऊ विज्ञापन देकर वोट बटोरने की कवायद की.....हालांकि ऐसा काम पहले कांग्रेस भी कर चुकी है......इससे सिर्फ एक ही बात का पता चलता है कि राजनीति की धुरी सिर्फ वोट है....वो चाहें कैसे भी आए...फिर चाहें साम,दाम,दंड,भेद की ही इस्तेमाल क्यों ना करना पड़े........सबसे अच्छी बात ये हुई कि इस बार के हमलें में हम सबने राजनीति का पूर्ण नग्न-स्वरुप देखा......और हमारे राजनेता इससे ज्यादा ज़लील पहले कभी नहीं हुए थे......
मुंबई हमलों में अगर विश्व चेता है तो सिर्फ इसलिए क्योंकि इस बार काफी संख्या में विदेशी मारे गए,वैश्विक दबाव के चलते पाकिस्तान बैकफुट पर तो है लेकिन ज़रदारी साहब अब तक ये मानने को तैयार नहीं कि इन हमलों में पाकिस्तान की ही मास्टर माइंड है.....और हां दिल के किसी कोने में मानते भी होंगे तो सार्वजनिक तौर पर स्वीकरोत्ति तो शायद कभी भी ना कर पाएं....
मीडिया कवरेज दोनो तरफ हुआ और दोनों ने ही अपनी-अपनी देशभक्ति दिखाते हुए कवरेज किया जिससे थोड़ा सा बैलेंस गड़बड़ाया भी.....फिर भी पाक के THE DAWN...,DAILY TIMES.....,और FRIDAY TIMES के नेट संस्करण देखने पर कहीं भी बायस नेस नज़र नहीं आई.....
पाकिस्तान एक अलग ही अंदाज़ में फंसा हुआ है,धार्मिक कट्टरता विकास नहीं होने देती और विकास नहीं होने से कट्टरपंथी ताकतें अपना फन और ज्यादा फैलाती हैं और उसे एक दलदल में ले जाती हैं।अगर पाक में इस्लामिक आतंकवादी हैं तो भारत में भी हिंदु आतंकवाद के चेहरे बेनकाब होने शुरु हो गए हैं.....फर्क सिर्फ इतना है कि भारत लगातार तरक्की कर रहा है....लिहाज़ा इसमें आम हिंदुस्तानी आतंकवादी नहीं है.....बल्कि यहां हिंदु आतंकवाद राजनीति का ही एक खंड है........।
पाकिस्तान ने लंबे समय तक फौजी शासन को झेला है...हम सभी जानते हैं कि फौज और राजनीति दो अलग-अलग पहलू हैं.....दोनों की भाषा अलग,सोच अलग और काम करने का जज़्बा अलग......।लेकिन पाकिस्तान में फौजी शासन देखकर तो उसके हालात पर सिर्फ तरस आ सकता है.......हुकुमतें बदलीं,चेहरे बदले लेकिन पाकिस्तान के हालात नहीं बदले.......।
आज पाकिस्तान अपने ही जाल में फंसा निरीह नज़र आता है...चारों तरफ देखने पर कट्टरपंथी ताकतें---लश्कर-ए-तैयबा,जैश-ए-मोहम्मद और जमातुदावा जैसे संगठन नज़र आते हैं जो पाकिस्तान की ग़रीबी का फायदा उठाकर अपने मंसूबे पूरे करते हैं.....पता नहीं पाकिस्तान कभी अपने गले में फंसी हड्डी निकाल भी पाएगा या नहीं..........।
हालांकि जनरल मुशर्रफ ने भारतीय संसद पर आतंकी हमले के बाद 2001 में पांच आतंकी संगठनों पर पाबंदी भी लगाई थी और थोड़ी बहुत दिखावटी कार्यवाई भी की थी.....जिसके बाद उन्होंने ज़बर्दस्त विरोध भी झेला था....पाक के हालात ही इतने अजीब हैं कि उन्हें बयां करना ही कई बार हास्यास्पद लगता है।
और हां आप सभी को जानकर ये आश्चर्य होगा कि लश्कर के साप्ताहिक अख़बार का प्रिंट ऑर्डर लाख के ऊपर था,साथ ही आतंकी संगठन जिन ठिकानों पर रहते हैं वहां की सुरक्षा को भेदना तो दूर ....परिंदा भी पर नहीं मार सकता......और इन सबके अलावा पाक में 2005 में आए भूकम्प में लश्कर की ही एक शाखा ने जनता की ज़बर्दस्त सेवा कर लोकप्रियता हासिल की थी।
पाकिस्तान इस वक्त सबसे ज्यादा बेबस है क्योंकि भारत के अलावा भी चौतरफा दबाब उस पर पड़ रहा है.......इस वक्त यदि इसने सही कदम नहीं उठाए तो आगे पछताना भी पड़ सकता है......लेकिन पाक से आतंकवाद का खात्मा हो जाएगा ऐसा हम नहीं मान सकते क्योंकि ऐसा तब तक नहीं हो सकता जबतक कि पाकिस्तानी आवाम उन्हें अपराधी नहीं मानती.....लेकिन ग़रीबी औऱ अंदरुनी मसलों से जूझती पाकिस्तानी जनता को ये सब समझने में कई सौ साल लग सकते हैं...क्योंकि वहां डेवलपमेंट नहीं है,शिक्षा नहीं है,रोज़गार नहीं है...कश्मीर को लेकर इतनी नफरत दिलों में घर कर गई हैं कि उसे वॉश-आउट करने में ही कई सदियां लग सकतीं हैं...........
कहते हैं ना खाली दिमाग-शैतान का घर......शायद अगर पाकिस्तान में भी डेवलपमेंट हुआ होता,वहां भी लोगों के पास रोज़गार होता और लोग शिक्षित होते तो शायद ये कट्टरपंथी इस्लाम के नाम पर जेहाद ना छेड़ पाते.......भोले -भाले लोगों की भावनाओं को इस तरह से कैश ना कर पाते और तब शायद इस्लाम एक दूसरे ही स्वरुप में पहचाना जाता...........सिर्फ एक ही दुआ है.....पाकिस्तान के लिए.....कि ये मुल्क भी तरक्की की राह पर चले और मासूम जनता की अज्ञानता दूर हो औऱ हम सभी को इस कट्टरपंथी आतंकवाद से निजात मिले........
आमीन......
एक माइक्रोपोस्ट...
जाल से लिपटे तार...
तार में उलझीं ज़िंदगियां...
ज़िंदगियों के फंसे आयाम.....
और उनसे निकलती सिसकियां....
ये ख़बर तो नहीं.....फिर क्या.......??
Friday, December 12, 2008
तलाश.....
वो शक्ल नहीं दिखती मुझे......एक धुंधली सी तस्वीर है...... ,जो डूबती है, उतरती है...मेरी यादों के समंदर से, क्योंकि शायद.... तुम वही हो जिसको मैं अक्सर तलाशा करती हूं....तुम्हीं ने उंगली पकड़कर सिखाया था चलना ,शायद कांधे पर बिठाकर मुझे मनाया भी था....,लेकिन मुझे ये कभी नहीं बतायाकि इक दिन चला जाऊंगा मैं, तब नहीं थामेगा कोई तुम्हारी उंगली ,ना ही कोई मनाएगा और बताएगा वो सब जो मैं तुम्हें बताना,सिखाना चाहता हूं...।
जाने क्यों याद आतीं है ..वो सारी खोई-खोई सी भूलीं सी तस्वीरें...एक कुहासा सा क्यों नहीं छाता मेरी यादों के पर्दे पर ...जहां खो जाऊं मैं...खुद ही....और न देख पाऊं ...ना जान पाऊं और ना समझ पाऊं ....उन तस्वीरों को और उन धुंधलाते चेहरों को......।।पर ऐसा कभी नहीं होता...एक जर्द सा एहसास है...मेरे ज़हन पर...मेरी यादों में....थोड़ा सा कड़वा और थोड़ा सख्त.........जो कभी कचोटता है मुझे और कभी तोड़ता भी है......
मन करता है तुम सामने आओ और तुमसे चीख चीख कर पूंछू...कि क्यों लाए मुझे यहां....जब नहीं संभाल सकते थे मुझे ....छोड़ दिया इस दरिया में .....जहां कोई मोल नहीं ...ना मेरा ना तुम्हारा और ना मेरे इन जज्बातों का....जिनके लिए मैं आज भी तरसती हूं.....लेकिन तुम तो क्या तुम्हारी परछाईं भी नहीं पकड़ सकती......सिर्फ तलाश कर सकती हूं ...उम्र भर
अट्ठाईस बरस गुज़र गए.....तुम्हारे अक्स को तलाश करते-करते...मैं थक गई ...लेकिन तुम नहीं मिले...।लेकिन पता नही क्यों .......कभी कभी ऐसा भी लगता है.........जैसे कि तुमने मुझे देखा....कुछ कहा...पर शायद मैं ही सुन नही पाई....
बड़ा अच्छा लगता है ये झूठा एहसास.....
क्योंकि ये मेरी दुनिया है........
जहां मैं रहती हूं..........
लोग कहते हैं......
खोई-खोई रहती हूं....
लेकिन कभी-कभी...
तुम वहां आते हो....
मुझे दुलारते हो........और बताते हो, वोही सब,जो मैं सुनना चाहती हूं....और जो कुछ तुम मुझे सुनाना चाहते हो....।
Wednesday, December 10, 2008
ख्वाब...
ख्वाबों की सरज़मीं पर सिमटते मेरे ये अंदाज़....
आज बहक जाने को जी चाहता है....
पता नहीं फिर कभी.......गुल्ज़ार होगी ये चिलमन या नहीं...
...उलझते.....सिमटते ये ख्वाब....
हमेशा सैर कराते किसी दुनिया की...
जिसकी सरज़मीं पर पांव रखते ही,
शायद शादाब हो जाती है,मेरी ये ज़िंदगी
कुछ ऐसा ही तो चाहती हूं मैं
लेकिन पता नहीं क्यों
हकीकत में आते ही सिमट जाती हूं.......
और वापस चली आती हूं ,
अपनी उसी दुनिया में,
कभी न लौट आने के लिए...................................!!!!
Tuesday, December 9, 2008
एक और शर्मनाक सच....
ये ख़बर मैं..एज़ इट इज़ रख रही हूं......बिना किसी फेरबदल के...
दांवपेच और लाल फीताशाही ने ताज और ओबेराय होटल में आतंकियों को खूनखराबे के लिए पूरा मौका दिया। हालात से निपटने के लिए मदद मांगी जाती रही लेकिन...... सुनने वाला कोई नहीं था। हमले वाली रात की बिखरी छोटी-छोटी घटनाएं जोड़ने से जो तस्वीर उभरती है.......वो अराजकता, भ्रम और घनघोर लापरवाही की है।
उसरात जैसे कोई सरकार नहीं थी, कोई सिस्टम नहीं था, कोई जवाबदेही नहीं थी। केंद्र सरकार को मिली रिपोर्टो से पता चलता है कि हमले की गंभीरता को समझते हुए भी आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई में बार-बार अफसरी बाधाएं खड़ी की गईं।
पहले मदद की चिट्ठी भिजवाओ.............
हमले की रात नौसेना की पश्चिमी कमान ने बिना लिखित आग्रह के कमांडो भेजने से दो टूक इनकार कर दिया। पुलिस कमिश्नर ने चिट्ठी भेजी तो यह कहकर खारिज कर दी गई कि पत्र मुख्य सचिव का होना चाहिए। तब मुख्य सचिव को लेटर फैक्स करना पड़ा। हालांकि सरकारी नियमों के मुताबिक जरूरत पड़ने पर एक जिलाधिकारी तक सेनाओं से मदद मांग सकता है। इस दौरान राज्य के मुख्य सचिव और अन्य वरिष्ठ अफसर मदद के लिए दिल्ली बराबर फोन करते रहे।
दो घंटे बाद पहुंचे कमांडो...........................
फरियाद के करीब दो घंटे बाद मौके पर पहुंचे नौसेना की कमांडो टीम ने होटलों के अंदर जाने से यह कहकर इनकार कर दिया कि वे ऐसी कार्रवाइयों के लिए प्रशिक्षित ही नहीं हैं। वे बाहर से ही गोलियां चलाते रहे, अंदर आतंकी घूम-घूमकर बंधकों की हत्याए करते रहे।
दिल्ली में भी था बुरा हाल..................
दिल्ली में भी एनएसजी के कमांडो की टीम घंटों एयरपोर्ट पर इंतजार करती रही। जरूरी रूसी आईएल-76 विमान न तो पालम एयरफोर्स स्टेशन पर था ना ही हिंडन पर...... तब इसे चंडीगढ़ से मंगवाया गया। एनएसजी के मुख्यालय मानेसर (हरियाणा) से भी खस्ताहाल बसों से कमांडो को रवाना किया गया।
टीम देर रात दो बजे मुंबई पहुंची....................
क्योंकि विमान सुस्त चाल था और तीन घंटे लग गए। बसों से रवाना हुई कमांडो टीम.......मुंबई हवाई अड्डे से टीम को बिजी सड़कों से बिना पायलट कारों के आम बसों से मौके के लिए रवाना कर दिया गया। जब तक उन्होंने होटलों के बाहर पोजिशन ली, सुबह हो आई और आतंकी काफी खून बहा चुके थे। एक सरकारी अफसर का कहना है कि कमांडो कार्रवाई में करीब छह घंटे की देरी हुई और इससे मौतों की तादाद बढ़ी।
आपदा प्रबंधन का पता नहीं था.......................
राज्य सरकार के एक वरिष्ठ अफसर का कहना है कि कोई ‘सिंगल प्वाइंट कमांड’ न होने से समय से मदद नहीं मिल सकी। कैबिनेट सचिव के एम चंद्रशेखर की अगुवाई वाली आपदा प्रबंधन समिति की बैठक भी आधी रात के बाद ही हो सकी। क्योंकि राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम के नारायणन रात सवा 11 बजे तक एक डिनर पार्टी में थे.......... और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जब उन्हें और बाकी सदस्यों को तलब किया तब वे रेस कोर्स रोड पहुंचे। इस अफसर का कहना है कि समिति के सदस्य घरों पर टीवी देखकर और मोबाइल पर बात करके घटनाक्रम पर नजर रख रहे थे।
क्या कोई भी कुछ कह पाएगा इस घटनाक्रम पर......क्या हमें अपनी नाराज़गी प्रकट करने का हक़ नहीं है......क्या हमें ये हक़ नहीं होना चाहिए कि हम इन सरकारी नुमाइंदों से जवाब मांगे.....और अगर ये जवाब ना दें तो इन्हें ताउम्र उस पद पर ना बैठने दिया जाए......जब ये सबसे ज्यादा संजीदा वक्त में अपनी ज़िम्मेदारियों का निर्वाह नहीं कर पाएं.....क्यों हमें हक़ नहीं है...चीखने का ,गुस्सा करने का और बदला लेने का......
Friday, December 5, 2008
अंधेरी ज़िंदगियां
राजस्थान के सूरतगढ़ आईकैंप में कुछ बुज़ुर्ग पहुंचे थे अपनी आंख का इलाज़ करवाने और ऑपरेशन करवाने.....कैंप भी लगा,ऑपरेशन भी हुआ,लेकिन आंखे ठीक होने के बजाए कुछ ही घंटो बाद उनमें दर्द होने लगा और मवाद पढ़ गया....वो सारे बुज़ुर्ग जो आंखों के अच्छा होने की आस लिए अपने घर गए थे.....एक बार फिर लौटे उन्हीं डॉक्टर्स की चौखट पर.......
आंखों की बिगड़ती हालत को देखकर कुल 48 मरीज़ों को पीबीएम अस्पताल पहुंचाया गया जिसके बाद सिर्फ पांच मरीज़ों की आंखे खतरे से बाहर बताईं गईं और बाकी के मरीज़ों को एसएमएस अस्पताल पहुंचाया गया.....
और इस बीच मरीज़ों से एक सहमति पत्र पर दस्तखत करवा लिए गए---
मेरी आंख का मोतियाबिंद का ऑपरेशन सूरतगढ़ कैंप में हुआ है। पहली पट्टी के बाद इलाज के लिए मुझे पीबीएम अस्पताल में भेजा गया। यहां जांच के बाद डॉक्टरों ने बताया कि आंख में मवाद पड़ गई है। अब आंख में इंट्रा वेटेरनल इंजेक्शन लगाए जाएंगे। इसके बाद रोशनी आ सकती है और नहीं भी। मैं पूरे होश-हवास में पीबीएम हॉस्पिटल के डॉक्टर्स को इलाज की सहमति देता/देती हूं।’
शनिवार रात जिस वक्त मरीज़ों से दस्तखत करवाए जा रहे थे वो देखने की हालत में नहीं थे...ऑपरेशन के बाद मरीजों की आंखों में आई खराबी को चिकित्सकीय भाषा में एंडोप्थोलाइटिस इन्फेक्शन कहा गया है।ऐसे इन्फेक्शन की कई कारण हो सकते हैं। इनमें प्रमुख रूप से प्रयोग में ली गई दवाइयों-सोल्यूशन में जीवाणु होना, ऑपरेशन थियेटर का दूषित वातावरण, ऑपरेशन के दौरान काम में लिए गए कपड़े गंदे होना या मरीज के कपड़ों में जीवाणु होना आदि हैं। चिकित्सकों का मानना है कि मरीजों की ओर से इनमें से कोई कमी होती भी तो उससे इक्का-दुक्का मरीज ही प्रभावित होते।
हालांकि रविवार सुबह नौ बजे सीएमएचओ एचएस बराड़ व एसडीएम रोहित गुप्ता ने ऑपरेशन थियेटर का निरीक्षण किया। उपकरण भी जब्त किए गए हैं।लेकिन ये सारी कवायद अब तक उन बूढ़े लोगों की आंखो की रौशनी वापस लानें में नाकामयाब रही.....
सवाल सिर्फ यही कि सरकारी होने का मतलब हमेशा ऐसा ही क्यों होता है.....हम चिल्लाते सिर्फ तभी क्यों है जब अपने ऊपर गाज गिरती है...क्या ये सरकारी डॉक्टर्स तब भी इतनी ही लापरवाही दिखाते अगर उन बुज़ुर्गों में कोई इनका अपना मां-बाप या सगा संबधी होता......क्यों हम एक घिस-पिटे ढर्र पर यूंही चलते रहते हैं.....क्यूं नहीं हम खड़े होते....जब हमारे सामने कुछ ग़लत हो रहा होता है.....शायद सब एक जैसे ही हैं.....सिर्फ अपनी बारी का इंतज़ार करते हैं और......बस यूं हीं......यूंही इंतज़ार करते हैं।
ज्यादा से ज्यादा क्या होगा.....शायद सरकार की तरफ से थोड़ा सा मुआवज़ा दे दिया जाएगा.....उन डॉक्टर्स पर थोड़ी बहुत कार्यवाही कर दी जाएगी और उसके बाद ये ज़िंदगी यूंही बोझिल फिर से घिसटती जाएगी.....लेकिन कोई भी उन लोगों का दर्द बांटने नहीं जाएगा जो अब भी अपनी ज़िंदगी के वापस रौशन होने का इंतज़ार कर रहे हैं, लेकिन ये नहीं जानते कि वो कभी अपनी खुशियों को दोबारा हासिल कर पाएंगे या नहीं.......क्योंकि डॉक्टर्स तो सहमति पत्र लेही चुके हैं कि आंखो की रौशनी जा भी सकती है और वापस आ भी सकती है।
Wednesday, December 3, 2008
इस्तीफा
हार्दिक खुशी हुई उनका इस्तीफा मंजूर हो जाने की......क्योंकि सिर्फ दो दिन पहले ही पत्रकारों से बात करते देशमुख कह रहे थे......मैनें अपना इस्तीफा आलाकमान को सौंप दिया है और -----अगर उन्हें लगता है--- कि मैनें अपनी ज़िम्मेदारी ठीक से नहीं निभाई तो मैं तैयार हूं .....
तो लीज़िए देशमुख साहब अब तो मुहर भी लग गई आपके गैर ज़िम्मेदाराना रवैए और आपकी करतूतों पर.........पर शायद आप... अब भी मानने को तैयार नहीं होंगे कि आपसे कुछ ग़लती हुई है........
तो पहले शिवराज पाटिल फिर आर आर पाटिल और अब विलास राव देशमुख.........लगता है जैसे कोई नाम छूट गया.....हां केरल के मुख्यमंत्री तो छूट ही गए.....अच्यूतानंदन जी,जिन्होंने अपनी ज़िंदगी में जितने भी घटिया काम किए होंगे उनमें सबसे निचले दर्जे का काम उन्होंने अपनी जिंदगी के अंतिम पड़ाव में किया......एक शहीद का अपमान करके......त्योरियां दिखा के ........और अपनी भूल ना मानने के लिए.........लेकिन क्या करें राजनीति चीज़ ही ऐसी होती है कि कुछ भी करा दे.....और आखिरकार राजनैतिक दबाब के चलते आपको माफी मांगनी पड़ी ........अफ़सोस आपकी कुर्सी नहीं गई....लेकिन हमें इंतज़ार रहेगा........
हालांकि आप जैसों के जाने से कोई खास फ़र्क नहीं पड़ेगा....आप जाएंगे कोई और आ जाएगा....आपकी उन्हीं ज़िम्मेदारियों को संभालने.......