Saturday, November 29, 2008

राज ठाकरे....जय महाराष्ट्रा..

अरे जाओ,कोई उस राज ठाकरे को ढूंढ कर लाओ,कहीं नज़र नहीं आ रहा...ग़ज़ब चिल्लाहट थी..कुछ दिन पहले तक....बड़ी हुंकार भरी थी.....मुंबई किसके बाप की है.....मैं बता दूंगा......अरे कहां चली गई वो चिल्लाहट.....कहां गया वो बाप.....कौन से बिल में छुपा है.....कहां गया वो मराठा प्रेम और मुंबई प्रेम...कहां चले गए थे राज....जब मुम्बई का सीना चीर कर मुम्बई वासियों को आतंकी दहला रहे थे.....ज़रा अब बोलो.......जय महाराष्ट्र

जवाब कैसे दोगे....क्योंकि कहने को तो कुछ है ही नहीं पास में.....सिर्फ राजनीति ही करनी आती है.....अरे नहीं तुम्हें तो वो भी नहीं आती.....जो कुछ मिला विरासत में मिल गया....क्योंकि तुम तो सिर्फ अपने चाचा की नकल किया करते हो और सिर्फ भड़काऊ भाषण देकर मराठवाद की आग भड़का कर.....अपनी परंपरा को आगे बढ़ा रहे हो....ज़रा ज़ोर से बोलो..
जय महाराष्ट्र

इतनी जल्दी अपनी ही कही कैसे भूल गए...कि मुंबई में बाहर का कोई नहीं आएगा...कहां गई थी तुम्हारी औकात,तुम्हारी कूवत जब तुम्हारे ही सीने पर पिछले कुछ महीनों से आतंकी इस धरती पर रहे और तुम्हारी....नहीं हम सबकी इस धरती पर आतंक का नंगा नाच करके चले गए...पर तुम सामने नहीं आए....क्या उस वक्त भी यही बोल रहे थे.....जय महाराष्ट्र

तुमसे क्या कहना तुम तो बिना मराठवाद औऱ राजनीति का चश्मा लगाए ठीक से देख भी नहीं पाते हो....इसलिए तुम्हें तो नज़र भी नहीं आया होगा कि शहीद हुआ मेजर दक्षिण-भारत का था और वहां हमारी इज्जत बचाने के लिए पहुंचे हुए एनएसजी के जवान किस किस प्रदेश के थे....लेकिन कोई बात नहीं....तुम सिर्फ बोलो......जय महाराष्ट्र

भारत की शान बचाने के लिए शहीदों की शहादत को सलाम ...हमें नहीं पता कि शहीद हुए ये जांबाज़ किस प्रदेश के थे....इन सब जांबाज़ो को इसलिए सलाम क्योंकि इन्होनें अपनी जान पर खेलकर हम सब की जान बचाई....हिंदुस्तान की इज्जत बचाई.......लेकिन तुम मत डरो....तुम्हें कोई नहीं कहेगा सलाम करने को......तुम सिर्फ बोलो.......जय महाराष्ट्र

शायद तुम भी नहीं भूले होगे....जब तुम्हारी मनसे के रणबांकुरों ने बिहार से आए छात्रों को रेल्वे स्टेशन पर दौड़ा-दौड़ा कर पीटा था....बहुत मर्दानगी महसूस कर थे ना तुम और तुम्हारे वो रणबांकुरे......लेकिन,आतंकियों के सामने तुम्हें अपनी नामर्दी का एहसास नहीं हुआ,ताज्जुब
चलो कोई बात नहीं,तुम चैन से रहो और माला जपो......जय महाराष्ट्र


तुम और तुम्हारी सेना जिस बिल में भी छुपी हो..........वहीं रहना.............कहीं कोई ये ना पूछ ले
अब कैसे बोलोगे...........जय महाराष्ट्र

हां भई.......तुम पर क्या फर्क पड़ेगा.....तुम तो आदी हो इन बातों के.......राजनीति में जो हो....
तुम सुनना तो नहीं चाहते होगे,लेकिन सुनो......इन आतंकवादियों ने चूलें हिला दीं.....सिर्फ मुम्बई की ही नहीं वरन समूचे भारत की.....क्योंकि ये हमला सिर्फ मुंबई पर नहीं था........ये हमारे देश पर हमला था...........तुम्हें सिर्फ इसलिए बताया जा रहा है क्योंकि तुम भी एक तरह के आतंकवादी हो........बस कर्मों का फर्क है......हालांकि तुममे और इन दरिंदों में ज्यादा फर्क नहीं....तुमने जो मराठवाद और क्षेत्रवाद की आग भड़काई थी उससे भी कुछ ऐसा ही मंज़र पैदा हुआ था........फर्क सिर्फ इतना था कि तुम्हारा निशाना बने......उत्तर भारतीय औऱ इन दरिंदो का निशाना बने भारतीय और विदेशी.........यही वो रेलवे स्टेशन था जिस पर तुमने अपनी दहशत का आतंक फैलाया.......अब कुछ होश आया या अभी भी ज्ञान बांट रहे हो.......-जयमहाराष्ट्र

इतना तकलीफदेह मंज़र था जिसने पूरे भारत को हिला दिया.......लेकिन तुम्हारी सेना पर कोई फर्क नहीं पड़ा ......नारे भी लगाए लेकिन आवाज़ सिर्फ एक......जय महाराष्ट्र

थोड़ी सी....सिर्फ थोड़ी सी शर्म कर लो.....कम से कम एक बार तो अपनी तरफ से तो कोशिश मत करो इस देश को बांटने की और तोड़ने की........इस देश की अखंडता और संप्रभुता को सलाम करो......कम से एक बार तो कोशिश करो........सबको गले लगाने और सबका सम्मान करने की........कोशिश करके देखो....भारतीयों का दिल बहुत बड़ा होता है.......शायद तुम्हारे गुनाह माफ कर दिए जाएं........और शायद फिर हम सब मिलकर बोल पाएं..........जय महाराष्ट्र











Wednesday, November 19, 2008

आतंक का नया चेहरा...

कोई भी न्यूज़ चैनल देखिए या फिर कोई भी अखबार....कहीं कोई जगह नहीं जिसमें हिंदु आतंकवाद का ज़िक्र नहीं हो...और हो भी क्यों ना...एक नया सा नाम है और एहसास भी हर बार से जुदा......क्योंकि हम सब तो ये मानकर ही चलते हैं कि आतंकवाद यानि इस्लाम और मुसलमान...

लेकिन इस बार आतंकवाद के घेरे में साधु और सिपाही के आजाने से तो हालात ही बदल गए है....कई ऐसे चेहरे जो हिंदी, हिंदु,हिंदुस्तान का नाम लेते नहीं थकते थे.......आज खुलकर बोलने को तैयार नहीं.....क्या माएने लगाए जाएं इसके....एक ही झटके में मानों सबकुछ बदल गया....अचानक से वो बहस जो सॉफ्ट टार्गेटेड होती थी और हमेशा ही पाकिस्तान,इस्लाम,बांग्लादेश,अलकायदा,आईएसआई के इर्दगिर्द शुरु होकर वहीं खत्म हो जाती थी.....आज कुछ और ही आयाम बयां कर रही है।

दो नामों ने तो वाकई हिला कर रख दिया.... साध्वी प्रज्ञा और लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत पुरोहित के आतंकवादी ब्लास्ट में शामिल होने ने अचानक उस धारणा को झकझोर दिया है जो मुसलमानों के खिलाफ होती थी और जो ये कहती थी कि हर मुसलमान चाहे आतंकवादी न हो लेकिन हर आतंकवादी मुसलमान जरुर है।

लेकिन हमेंशा की तरह ये बेवकूफ और कुछ हद तक भोली जनता शायद ये समझ नहीं पाती कि जो कुछ भी होता है उसके पीछे एक तयशुदा रणनीति होती है और मामला सिर्फ और सिर्फ वोट बैंक का होता है और इस वोट बैंक का जिम्मेदार कभी भी कुछ भी कर सकता है।

समाधान क्या है ये तो जनता ही तय करेगी.... लेकिन इतना जरुर है कि सिर्फ राजनीतिक पार्टियां बदलने से कुछ नहीं होता ,कोई मुसलमानों का हितैषी बनता है तो कोई जय श्री राम की हुंकार भरकर अपने हिंदुत्व का प्रदर्शन करना नहीं भूलता.....लेकिन उस जनता को कोई नहीं पूछता जिसका देश बंटता जा रहा है और लगातार बिक रहा है।

साध्वी का नाम सामने आने से प्रतिक्रियाएं भी अलग अलग आईं.....साधु संतो के आदर्श समाज की खोखली पड़ती नींव का आदर्श प्रतीक बनी साध्वी प्रज्ञा.......लगातार हुए धमाकों में नाम सामने आने से साध्वी ने हिंदुत्व की एक नई थ्योरी ही सामने रख दी.....

लेकिन विडंबना यही है कि कोई भी खोखली होती जड़ों को संभालने की कोशिश नहीं कर रहा......हर मोड़ पर अपना स्वार्थ सिद्ध करने वाले ये पाखंडी नेता यहां भी कोई कमी नहीं छोड़ रहे........बीजेपी राग अलाप रही है कि भारतीय संस्कृति से जुड़ा व्यक्ति आतंकवाद से नहीं जुड़ सकता तो कांग्रेस भी मुसलमानों का वोट पक्का करने में लगी हुई है कि देख लो बीजेपी का ये रुप एक हम ही हैं तुम्हारे हितैषी.....
लेकिन हर कोई फिर उन हालातों से अपनी आंखे ज़रुर मूंद रहा है जो आने वाले वक्त में हम पर हावी होने वालें हैं.....इसलिये जयपुर-अहमदाबाद-दिल्ली के आतंकवादी घमाको में मुस्लिम और मालेगांव में हिन्दु आतंकवादी नजर आ रहा है। जबकि ये कोई नहीं जानना चाहता कि दोनों ही भारतीय हैं।

Monday, November 3, 2008

बालिका -वधू

बात करें अगर छोटे पर्दे की तो कुछ बात करने लायक नजर नहीं आता....चारों तरफ वही रंगे-पुते नकली और भयावह सास-बहू के चेहरे .......वोही एक-एक शॉट के दस-दस रीटेक्स दिखाना.... जबतक कि कोई चैनल ही ना बदल दे......

लेकिन इन सबके उलट हाल ही में लॉंच हुए चैनल कलर्स पर आने वाला सीरियल-बालिका-वधू-अपनी लोकप्रियता की सारी सीमाएं लांघ चुका है......बेदम और उबाऊ हो रहे छोटे पर्दे पर बालिका-वधू एक ताज़ी सांस की तरह आया....
इस सीरियल में सबकुछ इतना गुंथा हुआ है कि कहीं कोई कमज़ोर कड़ी नज़र नहीं आती ....बेहद सादगी के साथ इसका प्रैजेंटेशन,सभी किरदारों का सशक्त अभिनय,केंद्रीय पात्र आनन्दी का भोलापन और मां साहब की भूमिका में सुलेखा सीकरी का किरदार इसमें जान डाल देता है।

पूरा सीरियल राजस्थान की पृष्ठभूमि में रचा गया है,हर चीज़ पर इतना बारीकी से ध्यान दिया गया है....कि कहीं कोई कमी नज़र नहीं आती ......।
लेकिन एक बात जो थोड़ा कचोटती है वो ये है कि क्या सामाजिक बुराई --बालविवाह--को दिखाने का थोड़ा भी लाभ मिलेगा......टीआरपी मिल रही है,पैसा मिल रहा है,लेकिन क्या सामाजिक जागरुकता आ रही है ......क्या वोही मांबाप जो इसे देख रहे है,पसंद कर रहे हैं......अपने आप को रोक पाएंगे जब आखातीज़ आएगी और ना जाने कितने ही मासूम आनन्दी और जगिया की तरह इस बंधन में बांध दिए जाएंगे.....।

शायद किसी को याद भी नहीं होगा कि कुछ सालों पहले मध्यप्रदेश के धार ज़िले में एक महिला अधिकारी के हाथ काट दिए गए थे....जो बाल विवाह जैसी कुरीति का विरोध कर रही थी.....मुझे पूरा विश्वास है कि कोई मुकदमा कायम नहीं हुआ होगा और किसी को सज़ा नहीं मिली होगी.....क्यों कि हम सब अपनी कानून व्यवस्था के बारे में बखूबी जानते हैं.....हमारे यहां कानूनी तौर पर अवैध घोषित कुरीतियां मरती नहीं हैं.. कोई वक्त गुजर कर भी सचमुच नहीं गुजरता।


इस सीरियल में आनंदी अनगिनत सवाल पूछती है लेकिन उसके जबाब उसे नहीं मिलते....वह कमसिन, कोमल और निर्मल है और उसके ज़हन में हज़ार सवाल उठते हैं।

इस सीरियल में कहीं कोई कमी नहीं सबकुछ एक खूबसूरत जड़ाऊ हार की तरह....बस इच्छा यही है कि इसकी चमक उन अंधे मांबापों की आंखे खोलने में कामयाब हो जो अंधविश्वासों और कुरीतियों को अपने तर्कों की तलवारें चलाते हुए अपने बच्चों को होम किए जाते हैं....

राज्य सरकारें भी बातें बड़ीं-बड़ीं करती है लेकिन कुरीतियों को रोकने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाती...... वोट बैंक के होव्वे ने ही इन कुरीतियों को पाला हैऔर बढ़ावा दिया है।

अनिल कुंबले...

कल अनिल कुंबले रिटायर हो गए....और इसके साथ ही खत्म हो गईं कुंबले को मैदान में देखने की लाखों-करोड़ो दीवानों की हसरतें भीं.....ये शायद कुंबले की गुगली जैसा ही था......आखिरकार उनकी जिंदगी में महत्वपूर्ण स्थान रखने वाले कोटला मैदान से उन्होनें वो अप्रत्याशित घोषणा कर ही दी....जिसके साथ ही सब लोग सकते में आगए....ये शायद सभी के लिए काफी ज़ोर का झटका था जो ज़ोर से ही लगा......और बहुत मुमकिन है कि ये उन लोगों के लिए भी झटका हो ......जो गाहे- बगाहे सीनियर खिलाड़ियों पर सन्यास का दबाब बनाने की कोशिश करते रहें है....

खैर कुंबले ने घोषणा कर ही दी और इसके साथ कुंबले हमेशा के लिए अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट से भी अलविदा हो गए।....अपने ही अंदाज़ में रहने वाले कुंबले ने इस फैसले के लिए भी अपना पसंदीदा मैदान ही चुना,वो मैदान जो उनकी ज़िंदगी में खास अहमियत रखता है......क्योंकि यही वो मैदान है...... जहां कुंबले ने 1999 में पाकिस्तान के खिलाफ एक टेस्ट पारी के सभी 10 विकेट लेकर अपना नाम इतिहास में दर्ज कराया था...
इतना ही नहीं, बीते 18 साल में वह भारत की ओर से एकमात्र मैच विजेता गेंदबाज भी रहे हैं.....जिसकी भरपाई करने में अभी काफी वक्त लगेगा....

लेकिन, कुंबले का ये फैसला इतना अप्रत्याशित था कि कमेंट्री बॉक्स में बैठे सुनील गावस्कर भी एक बार विश्वास नहीं कर पाए... लेकिन सच यही था... थोड़ी देर में जब खबर की पुष्टि होती गई तो कोटला मैदान में दर्शकों में भी सन्नाटा पसरने लगा... 18 साल से टीम इंडिया की गेंदबाजी की कमान संभाले चलने वाले कुंबले अपने चाहने वालों को भी इस फैसले से क्लीन बोल्ड कर चुके थे.....

आठ ओवर के खेल के बाद टेस्ट समाप्त हुआ और भारतीय क्रिकेट के सबसे सफल लेग स्पिन गेंदबाज का करियर भी थम गया......हालांकि कुंबले अभी ये सीरिज़ खेलना चाहते थे लेकिन शायद उंगली की चोट ने वक्त बदल दिया......इस फैसले के बाद ये तो लगता है कि कुंबले जैसे जीवट इंसान के लिए ये फैसला लेना इतना आसान नहीं रहा होगा........कुंबले इससे पहले भी चोटों से जूझते रहे हैं ......लेकिन सिर्फ एक ही दिन में इतनी सहजता के साथ अपने करियर के बारे में फैसला भी सिर्फ कुंबले ही ले सकते थे..

अपने अट्ठारह सालों के करियर में कुंबले ने सबकुछ देखा.....स्टारडम से दूर एक जैन्टिल मेन की छवि वाले कुंबले का व्यक्तित्व कितना सौम्य और सधा हुआ है इसकी बानगी हमसबने देखी.....जब सन्यास की घोषणा के बाद स्टेडियम में उनके साथियों और दर्शकों से उन्हें भावभीनी विदाई मिली...
40-45 साल से क्रिकेट की दुनिया को करीब और बारीकी से देख रहे वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी भी मानते हैं कि किसी भारतीय क्रिकेटर को ऐसी विदाई मिलते, उन्होंने नहीं देखी...

शर्मनाक शिवराज जी...

बड़े दिनों बाद आज एक बार फिर माननीय शिवराज पाटिल नज़र आए टीवी स्क्रीन्स पर.... लेकिन इस बार, हालात कुछ बदले-बदले से थे....अपने कामों से ज्यादा अपने सोफेस्टिकेटड नेचर और स्टायल के लिए पहचाने जाने वाले शिवराज........और दीन-हीन ,हाथ जोड़ते ,गुज़ारिश करते.....नौटंकी करते....अपनी कायरता जगजाहिर करते......शिवराज...विश्वास तो नहीं हुआ फिर थोड़ा गौर से देखा और सुना तो पता चला कि अपनी कायरता और काहिली का ठीकरा मीडिया पर फोड़ने की पुरज़ोर कोशिश कर रहे हैं......कह रहें हैं कि हमें बख्श दो....मत फैलाओ ये आग......मत बनाओ ये अराजकता का माहौल.......गोया मीडिया ना हुआ.....आतंक का पर्याय हुआ

माननीय शिवराज पाटिल जी ठहरे हमारे देश के गृहमंत्री...अब तो बोलते भी शर्म आ रही है......कुछ कहेंगे तो सुनना तो लाज़िमी है....लेकिन अफसोस.....जब देश के गृहमंत्री का ये हाल है तो बाकी देश का क्या होगा...बारहाल बकौल गृहमंत्री....देश के जो भी हालात हैं...उन्हें मीडिया फैलाकर जनता को भड़काने की कोशिश कर रहा है.....उनकी मानें तो, उनका कहना है कि अगर असम में बम फट रहें है तो उत्तर-भारतीयों को मत बताओ....उन्हें वहीं मरने दो और अगर मुंबई नफरत की राजनीति में जल रही है तो उसे बाकी देश के हिस्सों में मत बताओ...इससे अराजकता फैलती है....लोगों के अंदर आग भड़कती है.... लेकिन हाथ जोड़कर नौटंकी करते वक्त शिवराज जी ये भूल गए कि मीडिया क्षेत्रवाद के तहत काम नहीं करता.....

कुल मिलाकर शिवराज जी चाहते हैं कि मीडिया देश में फैल रही अराजकता और नफरत की राजनीति की तरफ से या तो मुंह फेर ले या फिर उनकी तरह काहिली और नाकारेपन का लबादा लाद ले.....ना आंखे खुली होंगी...ना कुछ ग़लत देख पाएंगे...और नाही कोई कदम उठाने की ज़रुरत पड़ेगी....लेकिन वो ये भूल गए कि जिस बेशर्मी के साथ वो हाथ जोड़कर मीडिया के सामने अपनी दरिद्रता दिखा रहे थे...वो मीडिया इससे पहले भी आपकी पोल जनता के सामने खोल चुका है कि ...किस तरह इस देश का गृहमंत्री बम-विस्फोट होने,लोगों के मरने और विलाप करते परिजनों के सामने जाने से पहले अपने पहनावे और अपने स्टायल का खास ख्याल रखता है कि कहीं एक जगह के लोगों के सामने जो कपड़े पहने हुएं ...दूसरी जगह भी गर वोही पहने चला गया तो जनता क्या कहेगी ...सांत्वना देने आए गृहमंत्री के पास एक ही जोड़ी कपड़े हैं......जब गृहमंत्री ही इतना ग़रीब है तो हमारी क्या मदद कर पाएगा......क्यों शिवराज जी कुछ ऐसा ही सोचा था ना....

शायद सोचा तो कुछ ऐसा ही था कि कुछ पूछने से पहले ही मीडिया के ऊपर दोषारोपण कर दो शायद कुछ फायदा हो ...जवाब ही ना देने पड़ें....लेकिन शिवराज की चाल उन्ही पर उल्टी पड़ गई.. लेने के देने पड़ गए और एक बार उनकी कुर्सी,उनके पद,ओहदे और इस देश की प्रतिष्ठा दांव पर लगी...सबने देखा,सबने सुना और सबने सराहा.....धन्य हों शिवराज जी.......