Thursday, August 28, 2008

मेरी उड़ान....

क्या पसंद है मुझे...
शायद
चिड़िया,पतंग,बादल
और हवाईजहाज़....
उड़ना बहुत अच्छा लगता है मुझे
सिर्फ और सिर्फ उड़ना.....
बचपन से अबतक ....
अपने ख्वाबों में उड़कर
मैं,शायद यहां तक पहुंची
लेकिन
इस उड़ने की क़वायद में
हाथ बढ़ते नज़र आते....
मेरे पंख नोचने के लिए
मेरे ख्वाब बींधने के लिए
लेकिन
फिर भी उड़ती हूं, मै....
एक अगली ऊंची उड़ान के लिए.............।।।।

सब्र....

बूंद-बूंद,
और इक बूंद
और इसी तरह
बूंद-बूंद करके
मेरे सब्र का प्याला
भरता जा रहा है......।
बहुत कोशिश करती हूं,
अपने आप को रोकने की,
समेटने की,सहेझने की
लेकिन
सफल नहीं हो पाती
नहीं ला पाती
अपने अंदर
वो वसुधा सा धैर्य
जो बांध पाए मुझे
मेरे छलकने से
और
दे पाए मुझे वो गहराई
जिसमें समा जाए
मेरे साथ-साथ इस
जहान की बुराई..........।।।।

दोहरी ज़िंदगी......

दोहरी ज़िंदगी.....
हम सभी जीते हैं।
चेहरे पे चेहरा लगाते हैं,
रोज़ नक़ाब पहनते हैं,
हंसते हैं,बतियाते हैं
दूसरे का गला काटते हैं
और आगे बढ़ते हैं.....
लेकिन
इसी कवायद में
कुछ लोग पीछे रह जाते हैं
जो नक़ाब नहीं पहन पाते
और वो नहीं कर पाते
जो सब करते हैं.....आगे बढ़ने के लिए.....
लेकिन ये कहां बढ़ जाते हैं और क्या
पाते हैं ........
ये उन्हें पीछे छोड़ने वाले
शायद कभी समझ नहीं पाते.....।।

Monday, August 25, 2008

काश....!!!

कुछ बींधता सा है,मुझे....
अजीब सी चुभन होती है,
उसके चले जाने से.....
उसका न होना,
उसके अहसास को और बढ़ाता है
लेकिन साथ ही ये भी जताता है......
कि दोस्त तो होते ही नहीं
ये तो अपनी सहूलत,
अपना गुणा-भाग होता है.....
शायद जिसे दोस्ती का नाम दे दिया जाता है......।
काश......!!!!! ये सच नहीं होता।

Saturday, August 23, 2008

वो लड़की...

भोली
मासूम
चंचल आंखे
खूबसूरत मुस्कुराहट....
कहीं खो गईं
ये सारी बातें
जब जाना
कि वो,
बिक चुकी है...
एक कसाई के हाथ
अपनी मंज़ूरी से.....
अचानक,
नासूर बन गई,वो मुस्कुराहट
फरेब नज़र आने लगा
वो चेहरा
सोच भी नहीं पा रही थी,मैं...
कैसे देखती होगी वो,आईना
कैसे संवारती होगी,अपने आप को,
कैसे जवाब देती होगी,
अपने अक्स को.......
क्या यही उसका होना है.......?
कैसे संभलता होगा,उससे वो जिस्म
जिसमें वो कसाई अपनी बोटियां
तलाशता होगा.....
कैसे बर्दाश्त करती होगी,
अपने चूर-चूर होते जिस्म को
कैसे झेल पाती होगी
उस वहशी के वो हाथ
जो बढ़ते हैं,
उसी की तरह दिखने वाली
हर गर्म बोटी की तरफ
औऱ..........
कैसे स्वीकार करती होगी
इस कड़वे सच को
कि उसने बेचा.....
अपने आप को ही नहीं
अपने मां-बाप
अपना शहर
अपनी पढ़ाई
अपनी परवरिश
और
अपने जन्म को
सिर्फ सिक्का-ए-रायज़ुल-वक्त के लिए.................!!!!!!

Friday, August 22, 2008

गिनती..

बचपन में सिखाई गई वो गिनती
आज हम सबकी ज़िंदगी का
हिस्सा बनकर रह गई है....
दिन रात हर कोई उलझता
नज़र आता
इन्हीं नम्बरों के फेर में....

मेरा अकेलापन...

कभी-कभी,
पता नहीं क्यों
इतनी भीड़ में भी
खुद को खड़ा पाती हूं
अकेला,बिल्कुल अकेला...
और कभी-कभी
ये अकेलापन
हावी हो जाता है
मेरे वजूद पर....
कचोटता है,मुझे,
मेरे मन को,
मेरे हर पल,हर लम्हें को,
तब बहुत याद आतें है
वो गलियारे
जहां काटा मैनें अपना बचपन
जहां नहीं होने का एहसास नहीं सालता
जहां मुझ पर अकेलापन हावी नहीं होता
और,
अब चाहकर भी दूर नहीं हो पाता
मेरा ये अकेलापन.......!!!!

Thursday, August 21, 2008

सपने......

सपने
बहुत देखती हूं मैं
दिन-रात,सोते-जागते
उठते-बैठते
ऐसा लगता है,जैसे
शायद
कभी सोई ही नहीं
कोई रात ऐसी याद नहीं
जो बिना सपनों के
गुज़र गई हो

उसने कहा-
सपने देखो,
लेकिन
हक़ीकत में जियो
हक़ीकत में?
वो क्या होता है,
कैसे जीते हैं,
ये मैं पूछती हूं
उसने कहा,
आसपास देखो
और आंखे खुली रखो
कैसे समझाऊं उसे..........
कि खुली आंखो से भी सपने देखती हूं,मैं....।

हक़ीकत...

क्या है सच.....?
ये हममें से कोई भी नहीं जानता।
और शायद जानने की कोशिश भी नहीं करता।
और कई बार जानकर भी अंजान हो जाता है।
कई चीज़ें ऐसी होती हैं,जिन्हें समझने के लिए हमें सोचना पड़ता है और कई बार सोचने की जरुरत भी नहीं पड़ती ,सबकुछ क्रिस्टल की तरह साफ नज़र आने लगता है।लेकिन मेरे साथ ऐसा नहीं होता.....लेकिन तुम्हें सोचना नहीं पड़ता??
तुम्हारे सामने सब कुछ साफसाफ अपने आप चलकर सामने आ जाता है,फिर ऐसा मेरे साथ क्यों नहीं होता???
तुम्हीं ने बताया था कि रिश्ते कुछ नहीं होते ,आंखे बंद करके देखो तो चारों तरफ रिश्तों की जगह शीशे नज़र आते हैं।बिल्कुल विश्वास नहीं होता कि आंखे बंद करके कैसे देखा जा सकता है??
लेकिन तुमने कहा कि देखो तो ज़रुर दिखता है,सारे शीशे दरअसल हम सबका रिफ्लेक्शन दिखाते हैं,उसमें हमारा अक्स नज़र आता है,लेकिन वो अक्स नहीं जो हम देखना चाहते हैं बल्कि वो,जो हम नज़रअंदाज़ करना चाहते हैं।और इन्हीं शीशों में दरअसल हमें हमारा कमीनापन,वहशीपन,मतलबपरस्ती और वो कालापन नज़र आता है,जो हम असल ज़िंदगी में देख नहीं पाते।
उन शीशों को या फिर यूं कहे उन रिश्तों को उनकी नज़र से देखें तो उनकी जगह बिल्कुल ठीक नज़र आती है,क्योंकि वो अपनी नज़र से ,अपने मतलब से और अपनी जगह बिल्कुल ठीक होते हैं।दरअसल वो ,वो नहीं होते जो हम उन्हें देखना चाहते हैं..........................सच में बहुत ही अजीब सा कॉम्पलिकेटड सा लगता है,ये सब।
लेकिन सच तो ये है हर इंसान मतलबी होता है,अपने मतलब के लिए अपनी ज़िंदगी अपने हिसाब से जीने की कोशिश करता है।किसी पर किसी का कोई एहसान नहीं................क्या प्यास लगने पर कोई बिना पानी के रह सकता है या फिर बिना खाए किसी का गुज़ारा हो सकता है?
जवाब है......नहीं
फिर झूठे वायदे और एहसान क्यों?
हर कोई अपने लिए जीता है,सबकी अपनी पर्सनल लाइफ होती है,इंसान सोता,जागता,खाता,पीता सिर्फ और सिर्फ अपने लिए ही करता है ।उसकी खुद की ज़रुरतें उसे कमाने के लिए मजबूर करती हैं और फिर भी हम सभी एक दूसरे पर एहसान जताने की कोशिश करके शायद अपने आप को तसल्ली देने की कोशिश करते हैं या फिर शायद अपना अहम संतुष्ट कर पाते है कि मैनें अपनी ज़िंदगी में फलां के लिए ये किया और उसके लिए वो किया .............!!!!!

Monday, August 18, 2008

देशभक्ति / बाज़ार

अभी-अभी पंद्रह अगस्त बीता और उसी एक दिन के साथ खत्म होती नज़र आई देशभक्ति भी। इसके पहले जो गली मुहल्ले तिरंगे के रंग में डूबे नज़र आ रहे थे अचानक एकदम फीके नज़र आने लगे। स्कूलों में हफ्ता, पंद्रह दिन पहले जो रंगारंग कार्यक्रम पेश करने के लिए रिहर्सल्स की कवायद चल रही थी (जो बच्चों के लिए महज़ क्लास-बंक करने का एक बहाना होती थी)...वो भी खत्म हो चली। और हां इसी बीच सारे होर्डिंग्स,बैनर,अखबार और खासतौर पर डिज़ायन किए गए एडवर्टीज़मेंट भी अलग से अपनी जगह बनाते नजर आ रहे थे...वो भी वापस अपने ट्रैक पर आ गए....सब कुछ बदल सा जाता है समय के साथ॥ कल तक -स्वतंत्रता दिवस- का समय था,,,मार्केट उसी के अनुरुप था,अब वो खत्म तो बाकी चीज़ें भी खत्म........लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं कि ये सब हमेशा के लिए खत्म.....नहीं-नहीं ये सब तो फिर से लौटने के लिए गया है...जीहां...सब कुछ बिल्कुल नई पैंकिग में हमे फिर मिलेगा....गणतंत्र दिवस पर,बस थोड़ा सा इंतज़ार और वापस हम एक दिन के लिए देश भक्त हो जाएंगे।
लेकिन इस दौरान हम सभी को सब कुछ अच्छा लगता है और लगे भी क्यों ना,सबकुछ ही तो पॉजिटिव दिखाया जाता है,आखिर देशभक्ति की बात है, हमारे भारत की बात है।
ये वही भारत है जिसके लिए नारा दिया जाता है......... इंडिया शाइनिंग। या दूसरे शब्दों में कहें भारत बदल रहा है,बढ़ रहा है।कहते हैं बदलने की और बढ़ने की प्रक्रिया अनवरत होती है....रुकती नहीं सिर्फ बढ़ती है,बदलती है और निरन्तर चलती रहती है।सब कुछ बहुत सुखद है क्योंकि सब कुछ बहुत सुंदर नजर आ रहा है....हालांकि इस सुन्दरता के पीछे दिखता तो बहुत कुछ है लेकिन उसे नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है....या यूं कहें कि कोई देखना ही नहीं चाहता ।
पंद्रह अगस्त को जब सुबह अपना टेलिविज़न ऑन किया तो पाया कि सारे ही चैनल्स देशभक्ति के रंग में डूबे हुए हैं...सबसे बड़ी खबर देशभक्ति की बनी हुई थी क्योंकि वोही उस वक्त की मांग थी और सिर्फ वोही बिकाऊ थी।
देश का बच्चा बच्चा उस वक्त सिर्फ और सिर्फ वोही नजारा देखना चाह रहा था,और जो नहीं भी चाह रहा होगा उसे चाहना पड़ेगा क्योंकि यही उस वक्त की डिमांड थी।
सभी कहते नज़र आ रहे हैं कि कितना अच्छा लग रहा है..अच्छा तो है.......लेकिन अफसोस किस बात का......?????
हां ...अफसोस होता है,अफसोस इस बात का होता है कि सब कुछ बिकाऊ क्यों हो गया ,तरक्की के मायने क्यूं बदल गए.....सबकुछ एकसमान क्यूं नहीं है।
जब तक स्वतंत्रता दिवस का खुमार उतरेगा....तब शायद कुछ चैनल्स को ये भी याद आए कि अरे..समाज का एक तबका ऐसा भी तो है ..जिसके लिए स्वतंत्रता दिवस या गांधी जयंती के कोई मायने ही नहीं होते...उन्हें सिर्फ एक शब्द का अहसास है और वो है......भूख...।जिसके लिए उन्हें फिर सुबह उठना है और दो जून की रोटी का इंतज़ाम करना है.......ये वही तबका है जिसे न्यूज़ चैनल्स वाले गाहे-बगाहे दिखाकर या ये कहना बेहतर होगा कि होली,दीवाली या फिर ऐसे ही कुछ विशिष्ट मौकों पर दिखाकर शायद जनता की हमदर्दी बटोरते हैं....प्रैक्टिकली कौन कितना करता है,ये तो हम सभी जानतें हैं।
लेकिन यहां लाख टके का सवाल सिर्फ इतना ही है कि तरक्की के मायने क्या हैं और इंडिया शाइनिंग के पीछे किस चेहरे की चमक है..इन भोले, मासूम,भूखे चेहरों की या फिर पेज थ्री सोशेलाइट्स की ??

Friday, August 15, 2008

बाज़ार/khabar

बड़े दिनों के बाद एक खबर आई जिसने थोड़ा सा झकझोर दिया,उस खबर को पढ़ने के बाद और उस पर अपने आप को बड़ा दिखाते हुए चर्चा करने के बाद अपनी आत्मा को धिक्कारने के अलावा और कुछ समझ नहीं आया ।समाज का कथित बुद्धिजीवी माने जाने वाले पत्रकारो की जमात में शायद ही कोई मानवीय संवेदनाओं और मूल्यों की बात करता होगा वरना तो सबके सब लकवा ग्रस्त नजर आते हैं।
खबर थी मध्यप्रदेश की जहां एक बूढ़े और मजबूर बाप 84साल के शंकर सिंह राठौर ने अपनी 57 वर्षीय मुंहबोली बेटी विमला बाई से शादी कर ली ...शायद ये खबर सुनने के बाद किसी की भी पहली प्रतिक्रिया मसालेदार हो सकती थी लेकिन सच जानने की जहमत किसी ने नहीं की ।खैर उस खबर को पढ़ा और पढकर अपने वजूद को धिक्कारा जिसमें ये ताकत तो नहीं कि किसी को रोटी दे लेकिन किसी के मुंह से निवाला छीनने की कवायद में जरुर हाथ बंटा दिया ।
शंकर सिंह और विमला बाई दोनों ने ये स्वीकारा कि हां उन्होने अकेलेपन को दूर करने के लिए शादी की है लेकिन सच शायद कुछ और ही था। अकेलेपन को दोनों बाप बेटी के रिश्ते में रहकर भी बांट रहे थे......लेकिन वजह सिर्फ एक ही थी ...उस गरीब लाचार और बूढे बाप को पता है कि वो बिस्तर पर पढ़ा है ,तबीयत लगातार खराब रहती है,बीवी को गुजरे छह महीने हो चुके हैं....और चौबीस घंटे नजरों के सामने 57साल की विधवा बेटी का उसके अलावा और कोई सहारा नहीं।विमला बाई इतनी पढ़ी लिखी नहीं है कि बाप के गुजरने के बाद अपनी जिंदगी सुकून से गुजार सकें।शायद उस बाप को और कोई चारा नजर नहीं आया कि वो जीते जी कागजो पर अपनी बेटी को अपनी बीवी घोषित कर दे जिससे उसकी बेटी जी सके और वो सुकून से मर सके क्योंकि शायद वो जानते है कि मरने के बाद जिंदगी का एक मात्र सहारा उनकी पेंशन उनकी बेटी को नहीं मिल पाएगी।
क्या कोई भी व्यक्ति उस बाप के अन्तर्मन को पढ़ने की या जानने की कोशिश कर सकता है कि उसने किन हालातों से गुजरने के बाद इतना बड़ा कदम उठाया होगा ।उस बाप के द्वन्द को शायद ही कोई समझ पाए जो ये जानते हुए भी कि समाज के कथित ठेकेदार उसकी जिंदगी अज़ाब कर देंगे,जीना मुहाल कर देंगे और उसके इस कदम को सामाजिक मान्यताओ के खिलाफ मानते हुए उसकी कितनी फजीहत करेंगे।
और ऐसा बिल्कुल नहीं कि 84साल के शंकर सिंह ने अन्जाने में ,बचपने में या फिर बिना सोचे समझे ये फैसला लिया हो।चौरासी साल की जिंदगी में उन्होंने जो कुछ देखा ,समझा जाना ....उसी के आधार पर ये फैसला लिया।वो शायद हमसे बेहतर जानते हैं कि हमारे बनाए गए इस समाज में अकेली औरत का जीना कितना मुश्किल होता है और तिस पर अगर वो विधवा हो तो सहारा देने के नाम पर जो हाथ सामने आते है उनमें सहारा कितना और दूसरी मंशाए कितनी होती है,ये सब जानते हैं।
उन्हे तो जो ठीक लगा वो उन्होने किया लेकिन उसके बाद शुरू हुआ तमाशबीनों का सिलसिला...जिन्होंने ये घोषणा कर दी कि क्या यही तरीका बचा था बेटी की जिंदगी संवारने का ,क्या यही हमारी संस्कृति है और क्या यही हमारे समाज का तानाबाना है।ये वही वर्ग है जो अपनी जिंदगी में लाख दिक्कत होने के बावजूद हमेशा दूसरों के बारे में जानकारी रखने में विश्वास रखता है..।और रही बात सामाजिक ताने बाने की तो कुछ दिन पहले ही उत्तर प्रदेश से खबर आई थी कि एक पोते ने अपनी 78साल की बूढ़ी दादी के साथ बलात्कार किया ।इसके अलावा दिनराता खबरों की बाढ़ में सबसे ज्यादा खबरे बलात्कार की ही होती हैं....जिसमें बाप बेटी के साथ ,भाई बहन के साथ और अब पोता दादी के साथ किस किस्म का रिश्ता निभा रहा है ,शायद सोचने की ज़रुरत नही ...ये भी हमारे समाज का एक हिस्सा हैं।
गरीबी से लाचार लोग अपनी बहन-बेटियों को बेच देते है...उन्हे कोई ये कहने नहीं जाता कि बेचो मत इन्हें पढ़ाओ..ये देवी का रुप है।दूसरी तरफ लोग सुबह अपने घरों से निकलते है...शंख बजाकर,,पूजा कर,मां के पैर छूकर ...लेकिन गाड़ी मे बैठने के बाद सिग्नल पर काम करने वाले बच्चों में से किसी एक को भी उठाकर उसे खाना तक नहीं खिलाते ...जिंदगी तो क्या ही बना पाएंगे।नवरात्र पर लोग कलश स्थापना करते हैं,छोटी बच्चियों को खाना खिलाते हैं उनके पैर छूते हैं.....लेकिन पूरे साल शायद ही किसी को अपनी जेब से पांच या दस रुपया निकालकर देते होगे.....लेकिन बातें सब बड़ी बड़ी और आदर्शों की करते हैं।
उस बाप की खबर इन लोगों के लिए जरुर मसाले दार हो सकती है जो अपनी बेटी से अनैतिक संबध बनाता है और साथ ही उसे धमका कर भी रखता है...क्योकि ये बिकाऊ खबर है।
लेकिन ये बाप तो बूढ़ा है,लाचार है ,दुनिया से कब चला जाएगा कुच पता भी नहीं....उसे ऐसी किसी जिस्मानी जरुरत का एहसास भी नहीं कि सामने बैठी विधवा बेटी के साथ बिस्तर में सोने की हसरत रखे.......फिर भी उसने ये कदम उठाया ।कोई भी नहीं जानता उसके हालात को ,उसकी सोच को क्योंकि किसी के भी हालात समझने के लिए हमें वो जिंदगी जीनी पड़ती है और जिसके लिए हममें से किसी के भी पास वक्त नहीं।
कोई नही जाएगा शंकर सिंह के मरने के बाद विमला बाई के सर पर हाथ रखने या उसका हाथ थामने ।कोई भी उससे ये नहीं पूछेगा कि खाना मिल रहा है या नही और जिंदा रहने का सवाल तो शायद ही कोई पूछे।
मेरा सवाल तो सिर्फ इतना है कि किसने इन लोंगो को हक दिया उनकी सीधी सादी जिंदगी में भूचाल लाने का .....
हमारे यहां तो शिफ्ट में काम होता है......लोग आते है,चले जाते है..और उसी तरह से खबरें भी आती है,चलती है और लोग भूलकर अगली खबर पर ध्यान लगाते हैं..और सब कुछ फिर से एक रुटीन में चलने लगता है।लेकिन हमने ये नही सोचा कि सिर्फ पच्चीस मिनट की फुटेज़ ने उस छोटे से शहर में रहने वाले शंकर सिंह और विमला बाई की कितनी बदनामी कर दी और बाकी बची जिंदगी जीने के तमाम रास्ते बंद कर दिए.........और अब तो इस खबर के बाद वो कागजी कार्यवाई भी पूरी नहीं हुई होगी जिसके लिए ये सारा बवाल हुआ।
क्योंकि हमारे जैसे जागरुक वर्ग ने तुरन्त अपना कर्तव्य निभाया और प्रशासनिक अधिकारियों के संज्ञान में ये बात लाकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली कि आपकी नाक के नीचे इतनी बड़ी घटना हो रही है और आप सो रहे हैं।
और रही बात सामाजिक मूल्यों की तो शायद ये बात या सच आपको इतना नागवार गुजरे कि आप बर्दाश्त ही न कर पाएं......
शायद आप नही जानते कि मेट्रोज़ में टीनएज लड़कियों का एबॉर्शन रेशो कहां जा रहा है......कितने लोग अपनी वर्जिनिटी टीनएज में लूज़ कर देते है और घर की चारदीवारी की बात करें तो क्या वहीं सड़ान्ध नहीं है......देवर -भाभी,जेठ-भाभी के अवैध संबधों की खबरे तो रोज़ ही खबरों में आती है।ये तो वो चीजें है जो सामने आती है और खबरों का हिस्सा बनती है लेकिन ऐसी कितनी ही गंदगी है जिसपर से पर्दा उठ ही नही पाता।क्योंकि हम सबको पाखंड की जिंदगी जीने की आदत पड़ गई है ।हम तो खबरों की ही दुनिया में रहते है,खबरों को ही जीते हैऔर खबरों में ही सोते है।अगर ये बातें समाज का कम पढ़ा लिखा वर्ग करे तो समझ भी आता है लेकिन समाज का चौथा स्तम्भ इतने खोखले विचारों और पाखंड की नींव पर खड़ा है..पता चलने पर ये एहसास घुटन वाला हो चला है कि हमसे बेहतर तो वो वर्ग है जो कम से कम इन बातों के लिए अपनी अज्ञानता की दुहाई तो दे सकता है।
अगर हम आज से कुछ साल पहले की बात करें तो बात कुछ हजम भी होती कि लोगों मे इतनी जागरुकता नहीं थी ,लोग जानते ही नहीं थे कि समाज में क्या हो रहा है।लेकिन आज का परिदृश्य एकदम बदल चुका है।आज हमारे पास अखबार है,रेडियो है और सबसे सशक्त माध्यम टेलीविज़न है।और इस पर भी समझ नहीं आए तो हम फिल्मों पर नज़र डाल सकते है।पहले कहा जाता था कि साहित्य समाज का दर्पण है लेकिन आज शायद फिल्में हमारा आईना बन चुकी हैं।
सामाजिक मूल्यों की दुहाई देने वाले लोग शायद ये भूल जाते है कि चलती गाड़ियों में ,ट्रेनों में ,अस्पतालों में और यहां तक कि स्कूलों में सब जगह बलात्कार की खबरें आती है ।आज कितने मांबाप ऐसे होगें जो अपनी बच्चियों को किसी टीचर के हवाले करके आशवस्त हो जाएं।
सवाल अगर करने हीं है तो अगर हम अपने आप से पूछें तो शायद बेहतर होगा कि सोसायटी कैसे खराब हो रही है या फिर हम उसी खराब और खोखली लेकिन ढो़गी सोसायटी में रहते है.....अपने आसपास नजर डाले हर इंसान एक दूसरे से झूठ बोलता नज़र आता है....क्या यही सब आदर्श सोसायटी का पैमाना होता है।
यही हकीकत है और इसे हम जितना जल्दी स्वीकार कर लें उतना ही बेहतर होगा इस समाज के लिए।
मेरा कहना सिर्फ इतना है कि दुहाई मत दो सामाजिक मूल्यों और संवेदनाओं की ,क्योंकि मानवीय संवेदनाएं अगर जिंन्दा होती तो दहेज के लिए लड़कियां जलाईं नहीं जाती ,प्रॉपर्टी के लिए भाई -भाई का कत्ल नहीं करता ,सिर्फ शक की बिनाह पर कोई पति अपनी पत्नी की सुपारी नही देता ,असफल प्रेम होने पर कोई तेज़ाब नहीं फेंकता और किसी पागल औरत को देखकर कोई उसका इलाज़ करवाता नाकि उससे अपनी जिस्मानी भूख मिटाता।

अभिनव बिन्द्रा

आज सुबह जैसे ही टीवी ऑन किया...सामने ऩजर आया अभिनव बिंद्रा ,ओलंपिक मे गोल्ड मेडल हासिल करता हुआ.....।इतनी खुशी हुई जैसे ज़ाती तौर पर मुझे कोई उपलब्धि हासिल हुई हो।पता नही शायद देशभक्ति का ही जज्बा था,जिसने आंखो में आंसू छलका दिए।तिरंगे को लहराता देखकर अपने राष्ट्रगान की धुन सुनते अभिनव बिंद्रा की खामोशी और सहजता वो सब कुछ बयां कर रही थी जिस वजह से अभिनव भारतीय गौरव को बढा पायालेकिन जैसे ही ये एहसास हुआ कि ये सौभाग्य भारत को सन अस्सी के बाद अब हासिल हुआ है थोड़ी शर्मिन्दगी महसूस हुई।उन्नीस सौ अस्सी के बाद पहली बार ओलम्पिक में भारत को गोल्ड मेडल यानि मेरे जन्म के बाद भारत का ये पहला गोल्ड मेडल पाने का स्वर्णिम मौका जिसे मैने भाग्यवश नहीं गंवाया औऱ एक एक क्षण का आनन्द लिया...क्योंकि ये मेरी जैनरेशन का पहला गोल्ड मैडल था।
गर्व और शर्म की स्थिति थोड़ा असहज तो कर रही थी लेकिन जब अभिनव के शान्त सौम्य और सरल चेहरे को मुस्कराते पाया तो एक बार फिर गर्व के साथ खुशी हुई।मात्र पच्चीस साल के अभिनव को देख कर सिर्फ यही लगा कि शायद उन्हे खुद पर इतना यकीं था कि ये पदक इस बार उसी का सीना चौड़ी करेगा।अभिनव बिंद्रा,जिसकी कामयाबी पर पूरा देश झूम उठा इतना शातंचित्त खडा नजर आया मानो कुछ हुआ ही नहीं....इतनी सहजता तो शायद मुझमें नहीं ।
दस बजे इस खबर के आने के बाद पूरे देश में खुशी की लहर दौड़ी और तुरन्त शुरु हुआ बधाईयों का सिलसिला ....हर टीवी चैनल पर कोई न कोई राज्य का मुख्यमंत्री अभिनव की खुशिंया बांटने के साथ साथ उसे सौगात देने की भी घोषणा कर रहा था।चारों तरफ फोनो सुनाई दे रहे थे और हर कोई अपनी तरह से आगे आने की कोशिश कर रहा था।बिन्द्रा पर राज्यसरकारों द्वारा दस लाख,पांच लाख,पच्चीस लाख के इनामों की बौछार हो रही थी और उधर बीजिंग में बिंद्रा शांतचित्त अपनी उपलब्धि के साथ खड़ा था।
खुशी तो बहुत हुई बिन्द्रा के गोल्ड मेडल जीतने पर लेकिन एक सवाल जो बार बार जहन में उठ रहा था,मायूस भी कर रहा था।सवाल सिर्फ इतना था कि आखिर
क्यों सन अस्सी के बाद आज,,,,,क्यो अट्ठाईस साल का वक्त लग गया एक बिन्द्रा को सामने आने में....क्या हमारे बीच या चारों तरफ फैली करोंड़ो-अरबों की आबादी में कोई और बिंद्रा नही....।
और उससे भी ज्यादा अफसोस होता है ये देखकर और सोचकर कि आज जब एक बिंद्रा जीतता है तो लाखों करोड़ो की बौछार होती है लेकिन क्या यही लाखों रुपए तब सामने आ पाते हैं जब हममे से कोई बिन्द्रा बनने की कोशिश कर रहा होता है...और अपनी आंखो में ओलंपिक में जाने का और पदक हासिल कर देश का नाम रौशन करने का सपना संजो रहा होता है।जवाब है...शायद नहीं.
नहीं इसलिए क्योंकि हम सब जानते है खिलाडियों के साथ क्या भेदभाव होता है किस तरह की राजनीति होती है...क्रिकेट के अलावा किसी और खेल को तवज्जोह ही नही दी जाती ।
हम ये बिल्कुल नही भूल सकते कि अभिनव को इस मुकाम ,इस उंचाई तक पहुंचाने में सिर्फ और सिर्फ उनके परिवार का ही हाथ है...क्योंकि बिंद्रा भी अगर उसी तबके से ताल्लुक रखते जो सरकार की तरफ मदद की आस लिए देखता है तो शायद आज भी ओलम्पिक में गोल्ड मेडल हम सिर्फ ख्वाबों में ही पाते।
हम सबको ये अच्छी तरह से मालूम है कि क्यों हमने अट्ठाईस साल का इंतजार झेला है इस पदक के लिए........ऐसा बिल्कुल नहीं कि करोंड़ो अरबों में कोई प्रतिभा नहीं लेकिन लाख टके का सवाल सिर्फ इतना है कि क्या कभी किसी ने ये कोशिश की ....जिस तरह से आज बिंद्रा पर सौगातें लुटाई जा रही हैं अगर इनमें से थोडी भी खेलों को प्रोत्साहित करने या खिलाडियो को आगे बढाने में खर्च की जाती तो शायद हम हर बार अपना सीना चौड़ा कर पाते।
बारहाल बिंद्रा की खबरों को देखते देखते ही पता चला कि पिछली बार एथेंस में सिर्फ एक प्वाइंट से पीछे रहने वाला सत्येन प्रसाद नामका एक प्रतिभाशाली खिलाड़ी पूरे साल सिर्फ ढाई लाख के धनुष के लिए तरसता रहा लेकिन किसी ने उसकी जरुरत पूरी नही की।ज़ाहिर तौर पर उसकी माली हालत ऐसी नहीं रही होगी कि वो खुद से उस धनुष को खरीद पाए,उसने अपनी तरफ से पुरजोर कोशिश की कि शायद खेलों के मद में आने वाली राशि में से थोड़ा सा भी उसे मिल पाऐ लेकिन नहीं...नतीजा सिफर ही रहा।शायद उसे कोई हक ही नहीं सपने देखने का ,उन्हें संजोने का क्योंकि वो उस वर्ग विशेष से ताल्लुक नहीं रख पाता जिन्हे दो जून की रोटी के लिए पसीना नहीं बहाना पड़ता है।यहां ये सिर्फ इसलिए बताया है कि ये तो सिर्फ एक सत्येन प्रसाद है लेकिन ऐसे न जाने कितने सत्येन प्रसाद होंगे जो पैसों के अभाव में अपने सपनों को दम तोड़ते हुए देखते हैं।
कुछ समझ नहीं आता कि क्यो और कब तक हम इसी तरह से भ्रष्टाचार को और बर्दाश्त करेंगे क्यों कोई निस्वार्थ कोशिश नही कर सकता इन सब बातों का जवाब देने की .....क्यों हमारे राजनेता अपने दावपेंच और अपनी कुर्सी के मोह को छोडकर थोड़ी सी भी देशसेवा की भावना को जाग्रत नहीं कर सकते .....लेकिन फिर भी उम्मीद पर तो दुनिया कायम है और शायद वो दिन आए जब हममें से कोई आगे आए और देश को स्वर्णिम शिखर तक ले जाएं ताकि कल जब सुबह तो अभिनव बिंद्रा और सत्येन प्रसाद दोनों पर ही हम सबको गर्व हो........

खोज.....एक नई दुनिया की.......

ब्लॉग का संसार यानि अथाह ज्ञान का भंडार ,सच कहुं तो बहुत मज़ा आया इस दुनिया को खंगालने पर ,वैसे तो मैं बहुत ज़्यादा नैट सैवी नहीं हुं लेकिन कभी -कभार टाईम पास करने के लिए तो नैट पर बैठना होता ही है.....बस,तो फिर सर्च इंजन पर ब्लॉग टाईपर करने पर जो मंजर सामने आया वो निंसदेह नितांत प्रशंसनीय था।
हममें से ज्यादातर लोग इस मशीनी जिंदगी को ढोते -ढोते रोबोट की भांति व्यवहार करने लगते हैं या यूं कहे इंसान से ज्यादा रोबोट बन जाते हैं..हर किस्म की रिश्तों,बातों को समय का बहाना लेकर टाल लेने की आदत में ढल जाते हैं।और शायद वक्त ही नहीं निकाल पाते अपने लिए,अपनी सोच के लिए और शायद अपने दोस्तों के लिए.....
इसीलिए शायद मुझे ब्लॉग इतना ज्यादा पसंद आया ,ये एक ऐसा रोचक माध्यम लगा जिसमें मैं अपने पंखो को बिना फैलाए उड़ सकती हूं और पूरा आसमां अपना सा नज़र आता है ।।यहां कोई पाबंदी नहीं आपकी सोच पर..कोई रोकने नहीं आ सकता आपको उड़ने से और नाही आपको इंतजार करना पडेगा अपने ही विचारों और अपने अंदर के जज्बे पर किसी की मोहर लगाने का।बल्कि एक अजीब सी आत्मसंतुष्टि मिलती है यहां अपने आपको देखने पर....।खैर ये तो मेरी निजी राय है।।
इतने रोचक और ज्ञानवर्धक मामले की सबसे रोचक बात इसकी नामावली लगी ...कस्बा,महुआ,चौपाल,भरोसा,बंजारा और भी न जाने क्या क्या.ये ब्लॉग्स अपनी चर्चा और अपने विचार प्रकट करने का तो एक माध्यम हैं ही साथ ही साथ हमें अपनी जड़ों से बांधे रखने का काम भी बखूबी कर रहे हैं।
लिखने और पढने दोनों पर ही यहां कोई बंधन नही....यदि किसी को आपकी बात पसंद नहीं या फिर आप किसी की बात से इत्तेफाक नहीं रखते तो बेशक आप स्वतंत्र है अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए।
ब्ल़ॉग बिल्कुल आपके मन की तरह प्रतीत होता कोई गति नहीं कोई बैरियर नहीं कोई सीमा नही,पता नहीं कब किस बात पर आपका मन मचल जाए और आपकी कलम उठ जाए माफ कीजिए...उंगलिया कीबोर्ड की तरफ बढ़ जाएं।
गांव की चौपाल से लेकर स्क़ॉटलैंड में पुर्नजन्म तक....मतलब आप सोंचे,टाइप करें और ये लीजिए मसाला तैयार....यहां आप बिहार के सत्तू से लेकर मेट्रोंज में मिलने वाले बॉइल्ड कॉर्नस(उबले भुट्टे)
तक पर लंबी बहस और व्यंग्य का मजा ले सकते हैं।
और बात सिर्फ यहीं खत्म नहीं होती है..ये ब्लॉग आपकी संवेदनाओ को भी कचोटता है और आपके दुलार को भी सहेजता है...ऐसा ही कुछ देखा मैनें बेटियों के ब्ल़ॉग में..जहां लोग अपने बच्चों की बातें अक्षरश आपके साथ शेयर कर सकते है और आप भी अपनी खुशियां दूसरों के साथ बांट सकते हैं।
ये ब्लॉग उन लोगों के लिए तो बहुत ही अच्छा है जो कहीं न कही सृजनात्मक और रचनात्मक है,आप यहां बहुत ही आसानी से अपने सपनों को संजो सकते है उन्हें आगे बढ़ा सकतें है...ठीक जगह पर उन्हें पहुंचा सकते है और यहां तक की पैसे भी कमा सकते हैं।और जैसा कि मैने पहले भी बताया साहित्यकार से लेकर फिल्मकार और फिल्मस्टार्स तक की एक लंबी फेहरिस्त यहां मौजूद है...तो इतना खुलापन तो अपने आस पास भी महसूस नहीं होता जितना ब्लॉग की इस दुनिया में है...ब्लॉग की सहूलियत और उपयोगिता को देखते हुए ही हर आदमी चाहें आम हो या खास इससे जुड़ना चाहता है.....।
औऱ अगर आपके पास समय की कोई कमी नहीं और जरा सा भी लिखने का शौक है तो स्वागत है आपका ब्लॉग की इस दुनिया में...।।.....